अबूबक्र का प्रतिनिधित्व समीक्षा के तराज़ू में

अक़ीदे
Typography
  • Smaller Small Medium Big Bigger
  • Default Helvetica Segoe Georgia Times

आयतुल्लाह सैय्यद अली हुसैनी मीलानी (दामत बरकातुहु)

हिन्दी अनुवाद: सैय्यद एजाज़ हुसैन मूसवी

प्राक्कथन

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

.... ईश्वर का अंतिम व सम्पूर्ण धर्म, आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के भेजे जाने बाद संसार वासियों के लिये पेश किया गया और ईश्वर का विधान व दूतों के आने और संदेश पहुचाने का सिलसिला आपकी नबूवत के साथ ही हमेशा के लिये बंद हो गया।

इस्लाम धर्म मक्का शहर में फला फूला और ईश्वर के संदेश वाहक हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम और उनके कुछ वफ़ादार साथियों की तेइस वर्षों की कड़ी मेहनत और अंथक प्रयत्नों के साथ पूरे अरब जगत में फैल गया।

ईश्वर के इस पथ को आगे बढ़ाने के लिये ज़िल हिज्जा की अठ्ठारह तारीख़ को, ग़दीरे ख़ुम के मैदान में मुसलमानों की आम सभा में ईश्वर के संदेशानुसार, उसके दूत हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने इस्लाम पर सबसे पहले ईमान लाने वाले हज़रत अली अलैहिस सलाम के हवाले किया गया।

उस दिन हज़रत अली अलैहिस सलाम की इमामत के ऐलान व उत्तराधिकारी बनाये जाने के साथ ही ईश्वर की उसके भक्तों पर नेमत तमाम और धर्म सम्पूर्ण हो गया और इस्लाम धर्म को ईश्वर ने अपना पसंदीदा घर्म घोषित कर दिया। जिसके कारण काफ़िर व मुशरिक इस्लाम धर्म के मिट जाने से मायूस हो गये।

अभी ज़्यादा समय नही गुज़रा था कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के आसपास रहने वालों में से कुछ लोगों ने पहले से किये गये प्लान व साज़िश के तहत उनकी वफ़ात के बाद, मार्गदर्शन व हिदायत के रास्ते से मुंह मोड़ लिया, मदीने के ज्ञान के दरवाज़े को बंद कर दिया और मुसलमानों को अनिश्चिता व अचंभे में डाल दिया। उन लोगों ने अपनी हुकूमत के पहले ही दिन से पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की हदीसों को लिखने से मना कर दिया, हदीसें गढ़ी जाने लगीं, जनता के दिलों में शंकाएं उत्पन्न की जाने लगीं, धोखाधड़ी, शैतानी चोला पहना जाने लगा, इस्लामी वास्तविकताओं को, जो चमकते हुए सूरज की तरह चमक रही थीं, उन्हे शक व शंका के काले बादलों के पीछे छुपा दिया गया।

स्पष्ट है कि सारी साज़िशों के बावजूद इस्लामी वास्तविकताएं व पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की अमुल्य हदीसें उनके उत्तराधिकारी हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम और उनके बाद उनके उत्तराधिकारियों मासूम इमामों अलैहिमुस सलाम और नबी (स) के वफ़ादार साथियों और सहाबियों के ज़रिये इतिहास में बाक़ी रह गई और हर ज़माने में किसी न किसी सूरत में प्रकट होती रहीं। उन हज़रात ने वास्तविकता के वर्णन, दो दिली मुनाफ़ेक़त, शैतानी बहकावों और इस्लाम विरोधियों का जवाब देकर हक़ीक़त को सबके सामने पेश कर दिया।

इस राह में कुछ नूरानी चेहरा लोग जिन में शैख़ मुफ़ीद, सैयद मुर्तज़ा, शैख़ तूसी, ख़्वाजा नसीरुद्दीन तूसी, अल्लामा हिल्ली, क़ाज़ी नूरूल्लाह शूसतरी, मीर हामिद हुसैन हिन्दी, सैयद शरफ़ुद्दीन आमुली, अल्लामा अमीनी आदि ... के नाम सितारों की तरह चमकते हैं। इस लिये कि इन लोगों ने इस्लामी व शिया समुदाय की वास्तविकता की रक्षा की राह में अपनी ज़बान और क़लम के साथ उस पर शोध किया और उन पर होने वाले ऐतेराज़ों व आपत्तियों का उत्तर दिया।

हमारे ज़माने में भी एक बुद्धिजीवि व विचारक जिन्होने अपने सरल क़लम और अच्छे बयान के साथ पवित्र धर्म इस्लाम की वास्तविकता के वर्णन किया है और हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की इमामत व विलायत की रक्षा आलिमाना अंदाज़ से की है और वह महान अनुसंधानकर्ता हज़रत आयतुल्लाह सैयद अली हुसैनी मीलानी हैं।

इस्लामी वास्तविकता केन्द्र को इस बात पर गर्व है कि उसने इस महान शोधकर्ता के क़ीमती आसार को अपने प्रोग्राम का हिस्सा बनाया है और उनकी किताबों को शोध, अनुवाद व प्रसार के साथ छात्रों, पढ़े लिखे लोगों और इस्लामी वास्तविकता के बारे में जानने वालों के हाथों तक पहुचाया जा सके।

यह जो किताब आप के हाथ में है वह इन ही लेखक की एक किताब का हिन्दी अनुवाद है ताकि हिन्दी भाषी लोग इसके अध्धयन से इस्लामी वास्तविकता को जान सकें।

हमे आशा है कि हमारी यह किताब इमामे ज़माना हज़रत बक़ीय्यतुल्लाहिल आज़म (अज्जल्लाहो तआला फ़रजहुश शरीफ़) की प्रसन्नता और पसंद का कारण बनेगी।

इस्लामी वास्तविकता केन्द्र

 


 

प्रस्तावना

बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन वस सलातु वस सलामु अला मुहम्मदिन व आलिहित ताहिरीन व लानतुल्लाहि अला आदाइहिम अजमईन मिनल अव्वालीना वल आख़िरीन।

शोध के सिलसिले की जो कड़ियां पिछली किताबों में प्रस्तुत की गई उन को ध्यान मे रखते हुए, हमने इमाम अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की प्रतिनिधित्व व इमामत की चुनिन्दा दलीलों को पवित्र क़ुरआन व पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की सुन्नत व अक़्ल की रौशनी में बयान किया। इन सारी बहसों में अहले सुन्नत के बुद्धिजीवियों के बहस के तरीक़ों को ध्यान में रखते हुए हमने उन तमाम शर्तों की, जो वह इमामत व ख़िलाफ़त के लिये मोतबर व अनिवार्य मानते हैं, रिआयत की है।

अहले सुन्नत मानते हैं कि इमामत व ख़िलाफ़त का चुनाव व इख़्तेयार जनता के हाथ में होना चाहिये और इसी बुनियाद पर वह इमाम व ख़लीफ़ा के लिये कुछ शर्तों को अनिवार्य समझतें हैं जिन के पाये जाने के कारण इंसान के अंदर प्रतिनिधित्व की सलाहियत पैदा हो जाती है।

हमने अपनी इस किताब में उन ही मोतबर व अनिवार्य शर्तों के अनुसार व अहले सुन्नत के बड़े बुद्धिजीवियों के कथन की बुनियाद पर शोध व रिसर्च की है और हज़रत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की इमामत को साबित किया है।

यहां पर उन ही बहसों को सम्पूर्ण करने के लिये, अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर अहले सुन्नत की दलीलों को पर बहस करेंगे। इस लिये कि जिस तरह से हमारे पास अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की इमामत व प्रतिनिधित्व पर बहुत सी दलीलें हैं उसी तरह से अहले सुन्नत के पास भी उनकी दृष्टि के अनुसार दलीलें हैं, अत: उन की छानबीन व पड़ताल करेंगे ता कि उनकी क़ीमत इल्मी मेयारों के अनुसार स्पष्ट हो सके।

हम इस किताब में अदब व सभ्यता और बहस व मुनाज़रे के तरीक़ों की अनिवार्यता का भी ख़्याल रखेंगे और ज़ाहिर है कि मुनाज़रे की बुनियाद यह होती है कि ऐसी दलीलें पेश की जायें जिसे दोनो स्वीकार करते हों, या यह कि एक गिरोह की दलील दूसरा गिरोह स्वीकार करे, ता कि इसकी बुनियाद पर मुनाज़ेरा किया जा सके और उसे स्वीकारने के लिये मजबूर किया जा सके।

इस मौज़ू पर हम अहले सुन्नत के उलामा की किताब व उनके कथनों को बुनियाद बना कर बहस व मुनाज़ेरा करेंगे और बहस व मुनाज़ेरे के आदाब, कथन व कलाम की संजीदगी व पक्षपात व बेबुनियाद तअस्सुब से परहेज़ को अपने ऊपर अनिवार्य करेंगें ता कि यह साफ़ हो सके कि अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में उनकी दलीलें, ख़ुद उनके उलामा व बुद्धिजीवियों के कथनुसार पूर्ण व सम्पूर्ण नही हैं और अगर ऐसा हुआ तो फिर वह हमें किस तरह से मजबूर कर सकतें हैं कि जो दलीलें ख़ुद उनके बड़े उलामा स्वीकार नही करते, उनके ज़रिये से हमारे लिये दलील पेश करें?

इन बहसों में हम अहले सुन्नत की जिन सबसे प्रसिद्ध व महत्वपूर्ण ऐतेक़ादी किताबों से दलील पेश करेंगे वह निम्नलिखित हैं:

धर्म शास्त्र (दीनीयात) की किताब मवाक़िफ़, शरहे मवाक़िफ़ व शरहे मक़ासिद।

यह किताबें आठवी व नवीं शताब्दी हिजरी क़मरी में लिखी गई हैं और मदरसों में पढ़ाई जाती हैं। अहले सुन्नत के माहिरे फ़न उस्तादों ने इन किताबों पर बहुत सी शरहें और हाशिये लिखे हैं।

अगर किताब कशफ़ुज़ ज़ुनून का अध्धयन करें तो पता चलेगा कि इस के लेखक ने ऊपर लिखी गई इन तीनों किताबों के बारे में क्या टिप्पणियां की है और इन किताबों पर कितनी बहुत सी शरहें और हाशिये लिखे गये हैं।

और एक लिहाज़ से यह किताबें मोतबर होने के मामले में बुनियादी हैसियत रखती है और दूसरी सारी किताबें इन्हे स्रोत बना कर लिखी गई हैं और इन्हे सारे उलामा स्वीकार करते हैं और अहले सुन्नत इन से दलीलें पेश करतें हैं और इन्हे मोतबर मानते हैं।

आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।

पहला भाग

अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर सबसे महत्वपूर्ण दलीलें

अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर अहले सुन्नत की ओर से पेश की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण दलीलें

अब हम अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर अहले सुन्नत की ओर से पेश की जाने वाली सबसे महत्वपूर्ण दलीलों की जांच पड़ताल करेंगे। किताब शरहे मवाक़िफ़ का मत्न इस तरह से हैं:

चौथा हिस्सा: अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहो अलैहि व आलिहि वसल्लम) के बाद उनके उत्तराधिकारी के बारे में हैं। प्रतिनिधित्व व इमामत हमारे अक़ीदे के अनुसार अबू बक्र से मख़सूस है जबकि शियों का मानना है कि पैग़म्बर (सल्लल्लाहो अलैहि व आलिहि वसल्लम) के बाद बर हक़ इमाम अली हैं।

इस मौज़ू के बारे में हम दो बातों का वर्णन करना चाहते हैं:

1. इमाम का चुनाव पैग़म्बर (सल्लल्लाहो अलैहि व आलिहि वसल्लम) के स्पष्ट कथनुसार होता है।

2. इमाम का चुनाव पर जनता के मतों पर आधारित होता है।

अलबत्ता नबी के बाद उनके प्रतिनिधित्व के बारे में ईश्वर और उसके दूत की ओर से कोई इशारा नही किया गया है और जहां तक इजमा (किसी बात पर सबका सम्मत होना) का सवाल है वह लिखते हैं कि अबू बक्र के अलावा किसी के लिये इजमा ज़िक्र नही हुआ है।

केवल तीन लोगों के प्रतिनिधित्व की सत्यता पर इजमा का गठन हुआ है: अबू बक्र, अली और अब्बास।

उन में से इन दो लोगों (अली व अब्बास) ने चूंकि अबू बक्र का कोई विरोध नही किया है लिहाज़ा अगर अबू बक्र सत्य पर न होते तो वह दोनो लोग उन पर आपत्ति अवश्य करते।

अत: अबू बक्र के प्रतिनिधित्व की दलील इजमा (किसी बात पर सबका सम्मत होना) के ज़रिये सम्पूर्ण व पूर्ण हो गई है।

ऊपर बयान होने वाले तर्क में इस बात को स्वीकार किया गया है कि अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से एक भी हदीस का वर्णन नही हुआ है। अत: अबू बक्र की ख़िलाफ़त के बारे में पहली दलील इजमा (किसी बात पर सबका सम्मत होना) और नबी (स) के किसी कथन का न होना है।

किताब शरहे मक़ासिद के लेखक प्रतिनिधित्व व ख़िलाफ़त को साबित करने तरीक़े की तीसरी बहस में इस तरह से लिखते हैं:

इमाम या ख़लीफ़ा को दो रास्ते से चुना जा सकता है, या पैग़म्बर (स) के स्पष्ट कथन से या फिर जनता की सर्व सम्मति से। अब पैग़म्बर (स) का स्पष्ठ कथन उनके बारे में नही है, लिहाज़ा वह जनता की सर्व सम्मति से ख़लीफ़ा चुने गये हैं।

स्पष्ठ हो गया कि अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) से एक भी हदीस बयान नही हुई है और उनकी ख़िलाफ़त पर दलील केवल इजमा (किसी बात पर सबका सम्मत होना) और जनता की राय है।

तीसरी बात जो इस सिलसिले में अहले सुन्नत बयान करते हैं वह अबू बक्र को सर्वश्रेष्ठ (अफ़ज़ल) साबित करने का रास्ता है। अत: जिस तरह से हम हज़रत अली अलैहिस सलाम के बेहतरीन होने पर बहस करते हैं उसी तरह से वह भी बहस करते हैं हालांकि इस बारे में उनके दृष्टिकोणों मे आपस में इख़्तेलाफ़ है, उन में से कुछ लोग सर्वश्रेष्ठ होने को प्रतिनिधित्व के लिये शर्त मानते हैं जबकि कुछ लोग शर्त नही मानते।

अत: जो लोग सर्वश्रेष्ठ होने को प्रतिनिधित्व के लिये शर्त नही मानते हैं वह अबू बक्र के अफ़ज़ल व सर्वोच्च होने पर ज़ोर नही देते। जैसे फ़ज़्ल बिन रोज़बहान, लेकिन जो लोग सर्वश्रेष्ठ होने को प्रतिनिधित्व के लिये शर्त मानते हैं आवश्यक है कि वह अबू बक्र के बेहतरीन होने पर ज़ोर दें, क्यों कि वह अबू बक्र की ख़िलाफ़त में आस्था रखते हैं।

जो लोग सर्वश्रेष्ठ होने को प्रतिनिधित्व के लिये शर्त मानते हैं, उन में से एक इब्ने तैमीया हैं वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अबू बक्र सारे सहाबा से अफ़ज़ल हैं और जो कुछ शिया इसना अशरी हज़रत अली अलैहिस सलाम के सर्वश्रेष्ठ होने के बारे में दलील देते हैं वह उन सब को झुटला देते हैं।

 

 

दूसरा भाग

 

अबू बक्र के सर्वश्रेष्ठ होने पर अहले सुन्नत की दलीलें

किताब मवाक़िफ़ और उसकी व्याख्या में इस तरह से वर्णन हुआ है:

पाचवां हिस्सा: पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बाद सर्वोच्च इंसान के बारे में है। हम और पहले के ज़्यादातर मोतज़ेली बुद्धिजीवि अबू बक्र को सर्वश्रेष्ठ इंसान मानते हैं जबकि शिया इसना अशरी और बाद के मोतज़ेली उलमा की आस्था के अनुसार अली बिन अबी तालिब अलैहिस सलाम अल्लाह के अवतार के बाद सबसे श्रेष्ठ इंसान हैं।

जो कुछ इससे पहले बयान किया गया है उससे यह स्पष्ट हो चुका है कि अहले सुन्नत की दलील अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे मे इजमा (सर्व सम्मति) और सर्वश्रेष्ठ होना है। अलबत्ता अगर उनके सर्वोच्च होने को विश्वस्त मान लिया जाये और यह भी मान लिया जाये कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) से अबू बक्र की ख़िलाफ़त के बारे में एक भी हदीस या कोई प्रतिक्रिया बयान नही हुई है।

हम अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की इमामत को इन तीनों रास्तों (नबी के स्पष्ठ कथन, इजमा और सर्वश्रेष्ठता) से साबित कर सकते हैं और परिणाम तक पहुच सकते हैं मगर यहां पर हम उनका वर्णन नही करना चाहते हैं।

वह लोग इस बात को स्वीकार करते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से अबू बक्र की ख़िलाफ़त के बारे में एक भी हदीस या स्पष्ठ कथन का ज़िक्र नही हुआ है।

अत: अबू बक्र के प्रतिनिधित्व को साबित करने का दावा करने वालों के लिये केवल दो रास्ते बाक़ी रह जाते हैं। एक सर्वश्रेष्ठता, दूसरे इजमा (सर्वसम्मति)

अब हम यहां पर उन दलीलों की समीक्षा व जांच पड़ताल करेंगे जो अबू बक्र की सर्वोच्चता के लिये पेश की जाती हैं:

 

पहली दलील

सबसे पहली दलील जो अबू बक्र की सर्वश्रेष्ठता के लिये पेश की जाती है वह पवित्र क़ुरआन की एक आयत है जिस में परवरदिगारे आलम का इरशाद हो रहा है:

و سیجنبھا الاتقی ۔ الذی یوتی مالہ یتزکہ ۔ و ما لاحد عندہ من نعمہ تجزی ۔

जल्दी ही लोगों में सबसे ज़्यादा तक़वे वाला इंसान (नर्क की आग) से दूर कर दिया जायेगा। निसंदेह जो भी अपने माल को लोगों में बांटता है ता कि उसका माल पवित्र हो जाये और किसी का हक़ उसके ऊपर बाक़ी न हो जिसका का वह पुन्य देना चाहे।

शरहे मवाक़िफ़ के लेखक लिखते हैं:

अकसर मुफ़स्सेरीन कहते हैं और बहुत से बुद्धिजीवि भी इस बात को मानते हैं कि यह आयत अबू बक्र की शान में नाज़िल हुई है। वह लोगों में सबसे ज़्यादा तक़वे वाले इंसान हैं और ऐसा इंसान जो तक़वे के मामले में सबसे आगे हो। अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा महबूब और पसंदीदा है। इस लिये कि पवित्र क़ुरआन में अल्लाह तआला का इरशाद हुआ है:

ان اکرمکم عند اللہ اتقاکم

निसंदेह अल्लाह के नज़दीक तुम में से सबसे ज़्यादा क़रीब और पसंदीदा वह इंसान है जो सबसे ज़्यादा तक़वे वाला है।

अत: अबू बक्र अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा सम्मानित और सर्वश्रेष्ठ इंसान हैं।

दूसरी ओर इस बात में कोई शंका नही है कि जो भी अल्लाह के नज़दीक सम्मानित और सर्वोच्च स्थान रखता होगा। ऐसे इंसान को अल्लाह के अवतार के बाद इमाम और ख़लीफ़ा होना चाहिये और यह बात ऐसी है जिस में किसी शक व शुबहे की गुंजाइश नही है। लिहाज़ा अबू बक्र सारे सहाबियों से बेहतर हैं और ऐसा इंसान जो सारी उम्मत से अफ़ज़ल व बेहतर हो, वही अल्लाह के नबी के बाद प्रतिनिधित्व व ख़िलाफ़त के लिये चुना जा सकता है।

 

दूसरी दलील

अबू बक्र के सर्वश्रेष्ठ व सर्वोच्च होने की दूसरी दलील पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की हदीस है जिस में आपने फ़रमाया:

اقتدوا باللذین من بعدی ابو بکر و عمر

मेरे बाद तुम सब इन दो लोगों की पैरवी करना, एक अबू बक्र दूसरे उमर।

इक़्तदौ शब्द अम्र (आदेश) का सीग़ा है और पैग़म्बरे इस्लाम (स) का यह संबोधन और आदेश सारे मुसलमानों के लिये हैं इसलिये यह अली बिन अबी तालिब अलैहिस सलाम के लिये भी है। लिहाज़ा उन्हे भी यह बात माननी और अबू बक्र व उमर की पैरवी करनी पड़ेगी। अब अली बिन अबी तालिब के लिये अनिवार्य है कि वह इन दोनो लोगों के आदेश पर अपना सर झुकाएं और जिस इंसान की पैरवी दूसरे लोग करते हैं वह लोगों का इमाम और मार्गदर्शक होता है।

अहले सुन्नत ने पैग़म्बर इस्लाम (स) की इस हदीस को अपनी किताबों में नक़्ल किया है। अत: नबी का यह कथन अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर दलील बन सकता है और उमर की ख़िलाफ़त इसी अबू बक्र की ख़िलाफ़त का हिस्सा बनेगी। अगर अबू बक्र की ख़िलाफ़त साबित हो जाये तो उमर की ख़िलाफ़त भी साबित हो जायेगी। हालांकि अभी हम उमर की ख़िलाफ़त के बारे में समीक्षा व जांच पड़ताल नही कर रहे हैं।

 

तीसरी दलील

अबूबक्र के सर्वश्रेष्ठ होने पर तीसरी दलील वह हदीस है जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से नक़्ल हुई है, आपने अपने सहाबी अबी दरदा से फ़रमाया:

واللہ ما طلعت شمس ولا غربت بعد النبیین والمرسلین علی رجل افضل من ابی بکر

ईश्वर की सौगंध नबियों के बाद सूरज अबू बक्र से बेहतर इंसान पर न ही उदय हुआ है और न ही डूबा है।

वास्तव में इस हदीस में यह योग्यता पाई जाती है कि यह अबू बक्र के प्रतिनिधित्व को स्पष्ट रूप से वर्णित करे और इस हदीस की रौशनी में अबू बक्र अली अलैहिस सलाम से सर्वश्रेष्ठ साबित हो जायेगें और बुद्धि भी आम इंसान पर प्रतिष्ठित इंसान को वरीयता देती है और या विद्धता रखने वाले इंसान पर बहुत ज़्यादा फ़ज़ीलत रखने वाले इंसान को आगे बढ़ाने को पसंद नही करती और उचित नही मानती है। अत: अल्लाह की नबी (स) के बाद जिस इंसान को उत्तराधिकारी होना चाहिये वह अबू बक्र हैं।

 

चौथी दलील

चौथी दलील पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की वह हदीस है जिस में आपने अबू बक्र व उमर के बारे में फ़रमाया:

ھما سیدا کھول اھل الجنۃ ما خلا البنیین والمرسلین ۔

अबू बक्र व उमर नबियों और रसूलों को छोड़ कर स्वर्ग के सारे बूढ़ों के सरदार हैं।

जो कोई भी किसी जाति का सरदार हो वह उसका मार्गदर्शक व नेता होता है यानी दूसरे सारे लोगों को चाहिये क वह उसकी बात मानें और उसकी पैरवी करें और चूंकि अली अलैहिस सलाम भी उसी क़ौम का हिस्सा हैं अत: उनका दायित्व अबू बक्र व उमर की पैरवी करना है क्यों कि वह दोनो लोग स्वर्ग के बूढ़ों के सरदार व नेता हैं।

 

पांचवी दलील

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की एक दूसरी हदीस पांचवी दलील के तौर पर पेश की गई है, जिस में आपने फ़रमाया:

ما ینبغی لقوم فیھم ابو بکر ان یتقدم علیہ غیرہ ۔

जिस जन समूह में अबू बक्र मौजूद हों, उस में किसी के लिये उन से आगे बढ़ना उचित नही है।

अत: किसी के लिये जायज़ नही है कि वह अबू बक्र से आगे बढ़े और सब में अली (अ( भी सम्मिलित हैं।

लिहाज़ा अली (अ) के लिये जायज़ नही है कि वह अबू बक्र से आगे बढ़े और किसी को यह हक़ नही है कि दावा करे कि अली (अ) अबू बक्र से सर्वश्रेष्ठ हैं। इस लिये कि उसका यह कथन अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के कथन का विरोधी है।

 

छठी दलील

इस सिलसिले की छठी दलील अल्लाह के दूत सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का वह कार्य है जो आपने अबू बक्र के बारे में अंजाम दिया है। आपने जमाअत की नमाज़ में जो कि सर्वोत्तम अराधना है, अबू बक्र को नमाज़ पढ़ाने के लिये आगे बढ़ाया। इसी कारण आपकी बीमारी के ज़माने में अबू बक्र ने आपकी जगह पर नमाज़ पढ़ाई और जो नमाज़ उस वातावरण में अबू बक्र ने पढ़ाई, हदीसों के अनुसार वह अल्लाह के नबी (स) के आदेशानुसार थी।

अत: अगर कोई नबी (स) की जगह नमाज़ पढ़ाये और उनके आदेशानुसार मुसलमानों के जन समूह का इमाम बने तो इस में यह योग्यता पाई जाती है कि वह अल्लाह के अवतार सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बाद मुसलमानों का मार्गदर्शक व नेता हो सके।

 

सातवीं दलील

सातवी दलील अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का वह कथन और हदीस है जिस में आपने अबू बक्र व उमर के बारे में फ़रमाया:

خیر امتی ابوبکر ثم عمر ۔

मेरी उम्मत में सर्वोत्तम अबू बक्र और उनके बाद उमर हैं।

यह वह हदीस है जिसका वर्णन अहले सुन्नत ने अपनी किताबों में किया है।

 

आठवीं दलील

आठवीं दलील अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का वह कथन और हदीस है जिसमें आपने अबू बक्र की दोस्ती के बारे में फ़रमाया:

لو کنت متخذا خلیلا دون ربی لاتخذت ابو بکر خلیلا ۔

अगर ईश्वर के बाद मुझे अपने लिये मित्र का चुनाव करना होता तो निसंदेह मैं अबू बक्र को अपना मित्र बनाता।

 

नवीं दलील

नवीं दलील अल्लाह के दूत सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का वह कथन और हदीस हैं जिस में आपने अबू बक्र के सामने फ़रमाया:

و این مثل ابی بکر کذبنی الناس و صدقنی و آمن و زوجنی ابنتہ و جھزنی بمالہ و واسانی بنفسہ و جاھد معی ساعۃ الخوف ۔

कहां है अबू बक्र जैसे लोग, जब लोग मुझे झुठला रहे थे उस समय उन्होने मेरी पुष्टि की और मुझ पर ईमान लाये, अपनी बेटी का मुझ से विवाह किया, अपनी जान और माल से मेरी सहायता की और जंग और जिहाद के मैदान में अकेलेपन और डर के वातावरण में मेरा साथ दिया।

आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।

दसवीं दलील

दसवी दलील हज़रत अली अलैहिस सलाम का वह कथन व हदीस है जिस में आपने फ़रमाया:

خیر الناس بعد النبیین ابو بکر ثم عمر ثم اللہ اعلم ۔

नबियों के बाद अबू बक्र और उनके बाद उमर सर्वश्रेष्ठ इंसान हैं और उन दोनों लोगों के बाद का ज्ञान केवल ईश्वर के पास है।

जो कुछ बयान किया गया वह ऐसी दलीलें हैं जो अहले सुन्नत अबू बक्र की सर्वश्रेष्ठता व सर्वोच्चता पर लाते हैं। यह दलीलें उनके मोतबर व विश्वस्त स्रोतों जैसे फ़ख़रे राज़ी की किताबें, किताब सवाएक़े मोहरेक़ा, किताब शरहे मवाक़िफ़, शरहे मक़ासिद आदि में ज़िक्र हुई हैं।

अलबत्ता बयान की गई दलीलें, अहले सुन्नत की ज़्यादा तर किताबों में चाहे गुज़रे ज़माने की किताबें हो या इस ज़माने की, मौजूद हैं। मोतज़ेला ने भी इन दलीलों से फ़ायदा उठाते हुए अशायरा का साथ दिया है। लेकिन हमारे युग से नज़दीक के मोतज़ेला उलमा अबू बक्र को सर्वश्रेष्ठ व सर्वोच्च नही मानते हैं, वह हज़रत अली अलैहिस सलाम को सारे सहाबियों में सर्वश्रेष्ठ मानते हैं और कहते हैं कि इस्लाम के हितों को ध्यान में रखते हुए प्रतिनिधित्व के मसले में अबू बक्र को अली (अलैहिस सलाम) से आगे बढ़ाना चाहिये।

 


 

तीसरा हिस्सा

अबू बक्र की सर्वश्रेष्ठता पर पेश की गई दलीलों का अपूर्ण होना

 

अबू बक्र के बेहतरीन होने पर अहले सुन्नत को ओर से दी गई दलीलों का अपूर्ण होना

जो कुछ बयान किया गया वह अबू बक्र के सर्वश्रेष्ठ होने पर अहले सुन्नत की दलीलें थीं, अब अगर कोई प्रश्न करे कि यह जो दलीलें बयान की गई हैं उनमें से उनकी सबसे महत्वपूर्ण दलील कौन सी है तो हम उसके उत्तर में कहेगें: उन दस दलीलों में से सबसे अहम दलील अबू बक्र के नमाज़ पढ़ाने की घटना और यह हदीस है:

اقتدوا باللذین من بعدی ابو بکر و عمر

मेरे बाद अबू बक्र व उमर की पैरवी करना।

यह उन में सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन हम उन सब दलीलों की एक एक करके हदीसों और अहले सुन्नत के ज्ञानियों के दृष्टिकोणों के अनुसार समीक्षा व जांच पड़ताल करेगें।

 

पहली दलील की समीक्षा व जांच

पहली दलील जो पेश की गई वह अल्लाह तआला का कथन और पवित्र क़ुरआन की आयत है। जिस में इरशाद हुआ है:

و سیجنبھا الاتقی ۔ الذی یوتی مالہ یتزکہ ۔ و ما لاحد عندہ من نعمہ تجزی

जल्दी ही लोगों में सबसे ज़्यादा तक़वे वाला इंसान (नर्क की आग) से दूर कर दिया जायेगा। निसंदेह जो भी अपने माल को लोगों में बांटता है ता कि उसका माल पवित्र हो जाये और किसी का हक़ उसके ऊपर बाक़ी न हो जिसका का वह पुन्य देना चाहे।

यह पवित्र क़ुरआन की एक आयत है, हमने दूसरी जगह पर बहसों में उन आयतों के बारे में जो मौला अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की इमामत व ख़िलाफ़त के बारे में हैं, इस तरह से ज़िक्र किया है:

इस आयत की दलालत अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के प्रतिनिधित्व से उस समय संबंधित हो सकती है जब हम उसे विश्वस्त दलीलों से साबित कर सकें कि यह आयत आपकी शान व फ़ज़ीलत में नाज़िल हुई है वर्ना इस आयत में भी पवित्र क़ुरआन की दूसरी सारी आयतों की तरह न तो हज़रत अली अलैहिस सलाम का नाम आया है न उनके अलावा किसी और का नाम आया है।

इस लिये इस आयत से दलील पेश करने से पहले उससे कुछ संबंधित बातों पर ध्यान देना पड़ेगा जो अबू बक्र के प्रतिनिधित्व को साबित करती हों:

अ. इस आयत से अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर तर्क उसी समय पेश किया जा सकता है जब हम अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम के मासूम होने पर दी जाने वाली सारी दलीलों पर से हमारा विश्वास उठ जाये। इस लिये कि अल्लाह के नज़दीक निष्पाप इंसान का महत्व उसकी राह में माल लुटाने वाले से ज़्यादा है।

अत: अगर यह आयत अबू बक्र के बारे में नाज़िल हुई हो तो दलील का संबंध इस बात से होगा कि शिया इसना अशरी की वह सारी दलीलें जो वह हज़रत अली अलैहिस सलाम के मासूम होने पर पेश करते हैं, उन सारी दलीलों का ग़लत साबित किया जाये, वर्ना अगर उन में से एक भी दलील साबित हो गई तो अली अलैहिस सलाम प्रतिष्ठा अल्लाह के नज़दीक सबसे ज़्यादा हो जायेगी और इस आयत के ज़रिये से अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर तर्क पेश करना ग़लत साबित हो जायेगा।

ब. इस आयत के ज़रिये दलील देने की बात और ईश्वर के नज़दीक अबू बक्र के सर्वश्रेष्ठ होने की बात उस समय पूरी हो सकती है जब अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस सलाम की सर्वोच्चता पर पेश की जाने वाली सारी दलीलें अपूर्ण साबित हो जायें। वर्ना वह सही और पूर्ण दलीलें उन हदीसों से जो इस आयत की व्याख़्या व तफ़सीर के अनुसार अबू बक्र को सर्वश्रेष्ठ घोषित करती हैं, एक दूसरे से टकराव पैदा कर देगीं और दोनों ही हुज्जत होगीं और टकराव की हालत में दोनो ऐतेबार से गिर जायेगीं। अत: यह आयत अबू बक्र के बेहतरीन होने पर दलील नही बन पायेगी। अलबत्ता इस शर्त के साथ कि इन दलीलों से अपनी बात को साबित करना सही हो और इस आयत से संबंधित हदीसें विश्वास योग्य हों।

वह जगहें जहां पर दलील की आवश्यकता नही पड़ती उन में से एक यह है:

हज़रत अली अलैहिस सलाम ने कभी किसी मूर्ती के आगे सजदा नही किया जबकि अबू बक्र ने बुतों से सामने सजदा किया है। यही कारण है कि जब अहले सुन्नत हज़रत अली (स) का नाम लेते हैं तो उनके नाम के साथ कर्रमल्लाहो वजहहु लिखते हैं जिसका मतलब है कि अल्लाह उनके चेहरे का सत्कार करे। यह चीज़ इस बात का सूबूत है कि अली अलैहिस सलाम का सम्मान ईश्वर के नज़दीक दूसरों से ज़्यादा हो।

स. इस पवित्र आयत से प्रमाणित करना इस बात से संबंधित है कि यह आयत शत प्रतिशत अबू बक्र के बारे में नाज़िल हुई हो। जबकि तफ़सीर व व्याख्या करने वालों की दृष्टि में इस पर इख़्तिलाफ़ पाया जाता है और इस बारे में तीन दृष्टिकोण पाये जाते हैं:

पहला दृष्टिकोण: यह आयत सारे ईमान वालों के लिये हैं और किसी एक ईमान वाले के बारे में नाज़िल नही हुई है।

दूसरा दृष्टिकोण: यह आयत अबू दहदाह की घटना और उस मर्द के बारे में नाज़िल हुई है जिसके पास खजूर का पेड़ था, जैसा कि तफ़सीरे दुर्रे मंसूर में इसका वर्णन हुआ है और इस का अबू बक्र के प्रतिनिधित्व से कोई भी संबंध नही है।

तीसरा दृष्टिकोण: यह आयत अबू बक्र की शान में नाज़िल हुई है।

अत: अबू बक्र के बारे में इस आयत के नाज़िल की संभावना, इन तीन दृष्टिकोणों में से एक है, और इस दृष्टिकोण के सही होने का संबंध हदीस की सनद के सही होने से है, और अगर इस हदीस की सनद पूर्ण न हो तो इस आयत से अबू बक्र के बारे में दलील लाना सही नही होगा।

अब हम आपको इस हदीस की सनद और उसके ग़लत होने के बारे में जो स्पष्टता पेश की गई है, उसे बयान करेगें:

इस हदीस को तबरानी ने ज़िक्र किया है और हाफ़िज़ हैसमी अपनी किताब मजमउज़ ज़वायद में तबरानी से नक़्ल करने के बाद लिखते हैं: इस हदीस की सनद में मुसअब बिन साबित आया है, जो हदीस शास्त्र के अनुसार ज़ईफ़ व अविश्वस्त है।

तीसरा दृष्टिकोण, जो ऊपर आने वाले तीन दृष्टिकोणों में से एक है, इस हदीस के ज़रिये दलील लाता है और चूंकि यह हदीस ज़ईफ़ (अविश्वस्त) है इस लिये इस दृष्टिकोण का कोई महत्व नही रह जाता है।

दूसरी बात यह कि मुसअब और उसका बेटा ज़ुबैर जैसा कि तफ़सीली किताबों में आया है, अहले बैत अलैहिमुस सलाम से बाग़ी थे। यहया बिन मुईन, अहमद बिन हूंबल और अबू हातिम, मुसअब को ज़ईफ़ (अविश्वस्त) मानते हैं।

निसाई उसके बारे में लिखते हैं: मुसअब हदीस नक़्ल करने की दृष्टि से मज़बूत नही है। इसी तरह से दूसरे हदीस शास्त्रियों ने भी उसके बारे में इसी तरह बातें कही हैं।

अब किस तरह से अबू बक्र के बेहतरीन व सर्वश्रेष्ठ होने के बारे में उस आयत से दलील लाई जा सकती है जिसकी तफ़सीर व व्याख्या के बारे में तीन अलग अलग दृष्टिकोण पाये जाते हैं, दूसरे जिस दृष्टिकोण में कहा गया है कि यह आयत अबू बक्र के बारे में है उसने ज़ईफ़ व अविश्वस्त हदीस को पेश किया है?

हम यहां पर फिर अपनी उसी बात को दोहरायेंगे कि इस तरह से दलीलें लाना इस बात से संबंधित है कि शिया इसना अशरी इमाम अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की सर्वश्रेष्ठता और इमामत के लिये जो दलील पेश करते हैं वह पूर्ण न हों।

 

दूसरी दलील की समीक्षा व जांच

उनकी दूसरी दलील वह हदीस है जिसमें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया:

اقتدوا باللذین من بعدی ابو بکر و عمر

मेरे बाद अबू बक्र व उमर की पैरवी करना।

यह हदीस उन बेहतरीन दलीलों में से है जिसे अहले सुन्नत अबू बक्र व उमर के प्रतिनिधित्व के लिये पेश करते हैं और अपनी दीनीयात और उसूले फ़िक़ह की किताबों में इसे दलील के तौर पर पेश करते हैं। वह लोग इस हदीस को दलील बना कर अबू बक्र व उमर के एकमत होने को हर काम के लिये हुज्जत मानते हैं और इस हदीस पर भरोसा करते हुए अबू बक्र व उमर की सीरत व सुन्नत के साबित करते हैं।

इसी कारण यह हदीस बहुत ज़्यादा महत्व रखती है विशेष तौर पर अहमद बिन हंबल अपनी किताब मुसनद बिन अहमद, तिरमिज़ी अपनी किताब सही तिरमिज़ी और हाकिम नैशापुरी अपनी किताब मुसतदरक में इसे नक़्ल किया है। इसी वजह से यह हदीस विश्वस्त व प्रसिद्ध किताबों में आई है और वह लोग इसे बहुत सी तरह तरह की बहसों में दलील बनाते हैं।

याद दिलाने योग्य बात यह है कि अगर कोई न्याय प्रिय शोधकर्ता इस हदीस की सनद की समीक्षा व जांच पड़ताल करे और ध्यान पूर्वक अहले सुन्नत के उलमा के उन दृष्टिकोणों का अध्धयन करे जो उन्होने इस हदीस के रावियों के बारे में बयान किये हैं तो वह देखेगा कि इस हदीस को जितने लोगों ने नक़्ल किया सबके सब ज़ईफ़ (अविश्वस्त) है। यह बात इतनी ज़्यादा स्पष्ट है कि अहले सुन्नत के बड़े और महान उलमा ने भी इस हदीस के बहुत से रावियों को ज़ईफ़ (अविश्वस्त) कहा है और हदीस शास्त्र के भिन्न भिन्न ज्ञान पर बहसों के ज़रिये उनकी कमियों और अपूर्णता को बयान किया है।

हमने इस रास्ते को समतल और शोधकर्ताओं की उनके दृष्टिकोणों तक पहुच आसान और सरल बनाने के लिये, अहले सुन्नत के उलमा की रायों का ख़ुलासा, जो उन्होने इस हदीस के रावियों के बारे में पेश किया है, तैयार किया है।

मनावी अपनी किताब फ़ैज़ुल क़दीर फ़ी शरहिल जामेइस सग़ीर में इस हदीस की व्याख्या करते हुए लिखते हैं:

अबू हातिम ने इस हदीस को स्वीकार नही किया है, उसे बीमार बताया है और कहा है कि बज़्ज़ार भी इब्ने हज़म की तरह इस हदीस को सही नही मानते हैं।

इस नक़्ल के अनुसार, अहले सुन्नत के तीन बड़े उलमा अबू हातिम, अबू बक्र बज़्ज़ार व इब्ने हज़मे अंदुलुसी ने इस हदीस को रद्द किया है।

दूसरी तरफ़ तिरमिज़ी जिन्होने इस हदीस को अपनी किताब में बेहतरीन सिलसिले के साथ नक़्ल किया है, स्पष्ट शब्दों में उसके रावियों को ज़ईफ़ (अविश्वस्त) कहा है।

दूसरी ओर अगर अबी जाफ़र उक़ैली की किताब अज़ ज़ुआफ़ाउल कबीर का अध्धयन किया जाये तो पता चलता है कि उन्होने अपनी राय को किस तरह से प्रकट किया है:

यह हदीस अस्वीकार्य है और इसकी कोई भी बुनियाद व स्रोत नही है।

मीज़ानुल ऐतेदाल के लेखक ने इसे अबू बक्र नक़्क़ाश से नक़्ल करते हुए लिखा है: इस हदीस का कोई महत्व नही है।

दार क़ुतनी जिन्हे हदीस नक़्ल करने के सिलसिले में चौथी हिजरी शताब्दी में अमीरुल मोमिनीन की उपाधि दी गई है वह इस हदीस के बारे में लिखते हैं: यह हदीस साबित नही है।

अल्लामा अबरी फ़रग़ानी (स्वर्गवास 743 हिजरी क़मरी) ने किताब मिनहाजे बैज़ावी की जो व्याख्या की है उस में वह लिखते हैं: यह हदीस जाली है।

हाफ़िज़ ज़हबी अपनी किताब मीज़ानुल ऐतेदाल में कई जगहों पर इस हदीस को पेश किया है और उसे जाली और ग़लत साबित किया है।

जब हम किताब मुसतदरक के सारांश का अध्धयन करते हैं तो देखते हैं कि हाकिम इस हदीस को पेश करने के बाद लिखते हैं: इस में कोई संदेह नही है कि इस हदीस की सनद बेकार है।

हैसमी अपनी किताब मजमउज़ ज़वायद में इस हदीस को तबरानी की सनद के साथ नक़्ल करते हैं और लिखते हैं: इस हदीस की सनद में ऐसे रावी हैं कि जिन्हे हम नही पहचानते (मजहूल) हैं।

इब्ने हजरे असक़लानी हाफ़िज़ व शैख़ुल इस्लाम ने भी लेसानुस मीज़ान में कई जगहों पर इस हदीस को ज़िक्र किया है और सारी जगहों पर उसके सही न होने को बयान किया है। इसी तरह से दसवीं शताब्दी के उलमा जैसे शैख़ुल इस्लाम हरवी अपनी किताब अद्दुर्रुल नज़ीद मिन मजमूअतिलव हफ़ीद, जो बाज़ार में उपलब्ध है, में लिखते हैं: यह हदीस जाली है।

इब्ने दरबेश हूत भी अपनी किताब असनल मतालिब फ़ी अहादिसा मुख़्तलिफ़िल मरातिब में इस हदीस को लाये हैं और उलामा के उन कथनो का ज़िक्र किया है जो उन्होने इस हदीस के अविश्वस्त (ज़ईफ़) और जाली होने के बारे में लिखे हैं।

दिलचस्ब बात यह है कि हाफ़िज़ इब्ने हज़्म अंदुलुसी ने इस हदीस के सिलसिले में दलील पेश करते हुए बहुत ही महत्वपूर्ण बात का वर्णन किया है वह लिखते है:

अगर किसी ऐसी बात जिसको छिपाने या बयान करने को, हम डरते हों कि अगर वह हमारे विरोधियों के हाथ लग जाये तो वह ख़ुशी के मारे उड़ने लगेंगे या ग़ुस्से व क्रोध से चुप्पी साध लेंगे, हम जायज़ समझ लेते तब निसंदेह हम इस हदीस को दलील के तौर पर पेश कर देते कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया होगा कि मेरे बाद उन दो अबू बक्र व उमर की पैरवी करना। जबकि यह हदीस सही नही है और अल्लाह हमें उस चीज़ से जो सही नही है, किसी चीज़ को साबित करने या दलील पेश करने से सुरक्षित रखे।

जो कुछ ब्यान किया गया उसके अनुसार, उचित नही है कि प्रतिनिधित्व जैसी बहस के लिये इस तरह की हदीस से दलील पेश की जाये, चाहे वह शिया इसना अशरी की तरफ़ से हो या अहले सुन्नत वल जमाअत की ओर से, यहां तक कि अगर हम अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की इमामत को इस जैसी हदीस, जिसे सारे उलमा ने अविश्वस्त (ज़ईफ़) बता कर ठुकरा दिया है, से दलील पेश करना चाहें तो कभी भी अहले सुन्नत पर आपत्ति नही कर सकते और हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त क साबित नही कर सकते बल्कि यह क्या किसी भी चीज़ को साबित करने के लिये इस जैसी हदीस से दलील नही ला सकते।

अहले सुन्नत में से कुछ लोग इस बात को जानते हुए भी यह हदीस विश्वास योग्य नही है और इसका कोई ऐतेबार नही है फिर भी जब उसे अबू बक्र के प्रतिनिधित्व को प्रमाणित करने और उसको अर्थ के लिहाज़ से फ़ायदेमंद देखते हैं तो लाचारी और झूठ में उसे शैख़ैन (अबू बक्र व उमर) या दो किताब सही बुख़ारी व सही मुस्लिम की ओर इसकी निस्बत दे देते हैं।

उदाहरण के तौर पर क़ारी अपनी किताब शरहुल फ़िक़हिल अकबर इला सहीहैयिल बुख़ारी वल मुस्लिम में इस हदीस की निस्बत सही बुख़ारी व सही मुस्लिम की तरफ़ दी है जबकि यह हदीस उन दोनों किताबों में है ही नही, अगरचे उन्होने इस बात को स्वीकार किया है कि यह हदीस सही नही है। लेकिन यह समूह इस बात से बेख़बर है कि एक दिन लोग उनकी किताबों में इसे देखना चाहेंगे और उसके मतलब के बारे में शोध व समीक्षा करेंगे।

यह कैसे संभव हो सकता है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम लोगों को अबू बक्र की उमर की पैरवी का आदेश दें जबकि उन दोनों लोगों में आपस में बहुत सी बातों में भिन्नता पाई जाती थी।

वास्तव में मुसलमानों को किसका अनुसरण करना चाहिये?

कैसे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम उन दोनो लोगों के अनुसरण का आदेश दे सकते हैं जब कि बहुत से सहाबी उनकी बहुत सी बातों और कार्यों की मुख़ालेफ़त करते थे?

क्या हम यह कह सकते हैं कि जिन लोगों ने भी अबू बक्र व उमर की मुख़ालेफ़त की वह फ़ासिक़ हैं?

 

तीसरी दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

तीसरी दलील वह हदीस है जिसमें अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने अबू दरदा से फ़रमाया: अल्लाह के पैग़म्बरों और संदेश वाहकों के बाद अबू बक्र व उमर से बेहतर इंसान पर सूर्योदय व सूर्यास्त नही हुआ।

अहले सुन्नत के यहां यह हदीस प्रबल अविश्वस्त (ज़ईफ़) है। तबरानी ने अपनी किताब औसत में उसे ऐसी सनद के साथ नक़्ल किया है जिसके बारे में हैसमी कहते हैं: हदीस की सनद में इस्माईल बिन यहया तैमी है जो कि झूठा इंसान है।

हैसमी ने इसी हदीस को किताब मजमउज़ ज़वायद में तबरानी से एक दूसरी सनद के साथ ज़िक्र किया है वह लिखते हैं: इस हदीस का एक रावी बक़ीय्या बिन अल वलीद है वह अविश्वस्त व धोखेबाज़ इंसान है।

अत: यह हदीस, हदीस शास्त्र के शास्त्रियों की दृष्टि में भी कोई ऐतेबार व हैसियत नही रखती है।

 

चौथी दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

अबू बक्र के सर्वश्रेष्ठ होने के बारे में अहले सुन्नत की एक पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की यह हदीस है जिस में आपने फ़रमाया: अबू हक्र व उमर स्वर्ग के बूढ़ों के सरदार हैं।

इस हदीस को बज़्ज़ाज़ और तबरानी ने अबू सईद से नक़्ल किया है और जिस समय हैसमी इस हदीस को उन दोनों से अपनी किताब मजमउज़ ज़वायद में नक़्ल करते हैं, इस तरह से लिखते हैं: इस हदीस के रावियों (नक़्ल करने वालों) में से एक अली बिन आबिस है जो हदीस के नक़्ल करने के मामले में विश्वास योग्य (ज़ईफ़) नही है।

हैसमी ने एक दूसरी जगह पर इस हदीस को बज़्ज़ाज़ के हवाले से उबैदुल्लाह बिन उमर से नक़्ल किया है और इस हदीस के एक रावी (हदीस नक़्ल करने वाला) जिस का नाम अब्दुर रहमान मलिक है, के बारे में लिखते हैं: उसके कथन पर अमल नही किया जा सकता।

यह बात भी याद रखने योग्य है कि इस हदीस की इन दो सनदों के अलावा हैसमी के पास कोई तीसरी सनद मौजूद नही थी जिसे वह पेश कर सकते।

 

पाचवीं दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

 

अहले सुन्नत पाचवीं दलील के तौर पर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की उस हदीस को पेश करते हैं जिसमें आपने फ़रमाया:

जिस जगह पर अबू बक्र मौजूद हो वहां पर किसी और के लिये उन से आगे बढ़ना उचित नही है।

इस दलील को रद्द करने के लिये जो चीज़ हमारे हाथ लगी है वह यह है कि हाफ़िज़ इब्ने जौज़ी इस हदीस को अपनी किताब अल मौज़ूआत में ज़िक्र करने के बाद इस तरह से लिखते हैं: यह हदीस अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम पर झूठ बांधने के लिये गढ़ी गई है।

जिस तरह से इब्ने जौज़ी के फ़तवे इब्ने तैमिया और उन जैसे लोगों के लिये मोतबर व विश्वस्त हैं उसी तरह से इस हदीस के बारे में उनकी यह बात भी उन लोगों की नज़र में विश्वस्त और मोतबर होनी चाहिये।

 

छटी दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

अहले सुन्नत की छटी दलील अबू बक्र की नमाज़ है, जो उन्होने नबी (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) की बीमारी के समय पढ़ाई है। यह दलील दो कारणों से महत्वपूर्ण है।

1. अबू बक्र के नमाज़ पढ़ाने की हदीस सही मुस्लिम व सही बुख़ारी में मुख़्तलिफ़ सनदों के साथ ज़िक्र हुई है और मुसनदों, सोननों और दूसरी ज़्यादातर विश्वस्त (मोतबर) और प्रसिद्ध किताबों में नक़्ल हुई है।

2. नमाज़ सर्वश्रेष्ठ आराधना व इबादत है। अब अगर पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम अपनी बीमारी और जीवन के आख़िरी दिनों में अबू बक्र को नमाज़े जमाअत पढ़ाने के लिये भेजते हैं तो वह इस बात की दलील है कि हुज़ूर (स) अपने बाद उन्हे अपने उत्तधिकारी के तौर पर पेश करना चाहते हैं।

अत: पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की जगह पर अबू बक्र के नमाज़ पढ़ाने से संबंधित यह हदीस उन बेहतरीन दलीलों मे से जो अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में पेश की जा सकती है और अगर आप अहले सुन्नत की किताबों का अध्धयन करें तो पता चलेगा कि वह लोग इस हदीस के सिलसिले में बहुत अधिक महत्व के क़ायल हैं और उनकी पहली और सबसे मज़बूत दलील जो वह अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर लाते हैं यही अबू बक्र के नमाज़ पढ़ाने वाली हदीस है।

वह लोग इस हदीस को पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के कुछ सहाबियों से नक़्ल करते हैं, इस हदीस की पहली रावी आयशा अबू बक्र की बेटी हैं लेकिन अगर आप उसकी सनदों पर ध्यान दें तो पता चलता है कि यह हदीस ना मालूम व अज्ञात लोगों से नक़्ल की गई है या यह बात आयशा के ज़रिये सुनी है और वही इस हदीस के सिलसिले की अस्ल कड़ी हैं।

अत: इस हदीस की सारी सनदें आयशा तक जाकर ख़त्म होती हैं और वह इस हदीस के बयान करने के सिलसिले में दो कारण से दोषी ठहराई जा सकती है:

1. अली अलैहिस सलाम से उनकी दुश्मनी।

2. यह कि वह अबू बक्र की बेटी हैं।

अगर अली अलैहिस की उनकी दुश्मनी को नज़र अंदाज़ कर दिया तब भी अगर इस घटना की विशेषताओं और गवाहों के अनुसार जो ख़ुद हदीस में आई हैं और इसी तरह से इस वाक़ेया से संबंधित गवाहों पर ग़ौर व ध्यान पूर्वक देखें तो बख़ूबी इस बात का अंदाज़ा हो जाता है कि अबू बक्र को नमाज़ के लिये भेजना पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की तरफ़ से नही बल्कि ख़ुद आयशा ने अपनी मर्ज़ी से यह काम अंजाम दिया है।

इस बात के सबसे अहम गवाह, जिससे इस घटना को समझने में बहुत मदद मिल सकती है, अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का आदेश है जिसके अनुसार सारे सहाबियों के ओसामा की फ़ौज के साथ मदीने से बाहर निकल जाना था। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी पल तक इस बात पर ज़ौर देते रहे कि वह सब ओसामा के लश्कर के साथ मदीने से बाहर चले जाये।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के ओसामा की फ़ौज को भेजने के बारे में उम्र के आख़िरी पल तक चेतावनी देते रहने के बारे में कोई संदेह नही है और किसी ने इस बारे में कोई विरोध नही किया है और यह बात हमारी और अहले सुन्नत दोनों की किताबों में बयान हुई है।

दूसरी तरफ़ पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बुज़ुर्ग सहाबियों जैसे अबू बक्र व उमर के इसमें शिरकत करने के आग्रह के बारे में भी कोई इख़्तिलाफ़ नही पाया जाता है और बहुत सी विश्वस्त किताबो में जिस में यह हदीस नक़्ल हुई है यह बात साबित हो चुकी है। इन सारी बातों के बाद अब किस तरह से यह संभव हो सकता है कि एक तरफ़ तो पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम अपने पवित्र जीवन के अंतिम पलों में अबू बक्र को आदेश दे रहे हैं कि वह ओसामा की फ़ौज में सम्मिलित हो जाये और मदीने से बाहर चले जायें। दूसरी तरफ़ उन्हे यह हुक्म दे रहे हैं कि मेरी जगह पर लोगों को नमाज़ पढ़ाये?

यहा कारण है कि इब्ने तैमिया जैसे लोग इस बात पर मजबूर है कि वह ओसामा के लश्कर में अबू बक्र के शामिल होने की बात को झुटलायें और कहें कि यह बात झूठी है। इस लिये कि उन्हे मालूम है कि ओसामा के लश्कर में शामिल होने का मतलब यह है कि उनका नमाज़ के लिये भेजा जाना झूठ है। लेकिन जैसा कि अबू बक्र का नमाज़ पढ़ाना उनके प्रतिनिधित्व को साबित करने की सबसे महत्वपूर्ण दलील है। इस लिये वह मजबूर हैं कि उनके ओसामा के लश्कर में शामिल होने को स्वीकार न करें जबकि ओसामा के लश्कर में अबू बक्र के शामिल किये जाने का इंकार करना संभव नही है।

अब यहां पर हम उदाहरण को तौर पर केवल एक बात का वर्णन करना चाहते हैं:

हाफ़िज़ इब्ने हजरे असक़लानी अपनी किताब फ़तहुल बारी बे शरहे बुख़ारी में लिखते है: ओसामा की फ़ौज में अबू बक्र के शामिल होने वाली हदीस को वाक़ेदी, इब्ने सअद, इब्ने इसहाक़, इब्ने जौज़ी, इब्ने असाकर और दूसरे लोगों ने नक़्ल किया है।

जिस समय पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने इस संसार से कूच किया। ओसामा मदीने के बाहर अपने लश्कर के साथ छावनी में थे और जब अबू बक्र ने हालात को अपने क़ाबू मे कर लिया, ओसामा ने उनके हाथ पर बैअत नही की और कहा: मैं अबू बक्र का सरदार हूं मैं किस तरह से उनसे बैअत कर सकता हूं। यही कारण था कि अबू बक्र ने ओसामा से उमर के बारे में अनुमति ली कि उमर मदीने में ठहर जायें ता कि वह उन से हुकूमत के कामों में सहायता ले सकें।

सारी बातें इस बात की गवाही देती हैं कि अबू बक्र को नमाज़ पढ़ाने के लिये भेजने वाली हदीस झूठी और ग़लत है लेकिन हम यहां पर ठहरना उचित नही समझते इस लिये बात को आगे बढ़ाना चाहते है और वह यह है कि अली अलैहिस सलाम इसी तरह से अहले बैत के घराने के सारे लोग इस बात में आस्था रखते थे कि अबू बक्र का नमाज़ पढ़ाने के लिय आना अल्लाह के नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के आदेशानुसार नही था बल्कि आयशा ने उन्हे इस काम के लिये भेजा था।

इब्ने अबिल हदीदे मोतज़ेली इस बारे में लिखते हैं: मैंने अपने शिक्षक से इस घटना के बारे में प्रश्न किया कि क्या आप मानते हैं कि आयशा ने अपने बाप को नमाज़ पढ़ाने के लिये भेजा था या अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने नही भेजा था?

उन्होने उत्तर दिया: मैं ऐसा नही मानता हूं लेकिन अली अलैहिस सलाम ऐसा मानते हैं और उनका दायित्व मेरे दायित्व से अलग है इस लिये कि वह वहां पर मौजूद थे जबकि मैं वहां पर उपस्थित नही था।

इस घटना की जांच में हम यहीं पर भी ख़त्म नही करना चाहेंगे बल्कि और पड़ताल करेंगे:

अगर यह मान लें कि अबू बक्र को ऐसा करने का आदेश अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने दिया था तब भी यह बात दलील नही बन सकती, क्यों कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) अपने पवित्र जीवन काल में बहुत से सहाबियों को नमाज़ पढ़ाने का हुक्म दिया करते थे कि वह मस्जिद में उनकी जगह पर नमाज़ पढ़ायें और इस नमाज़ पढ़ाने की वजह से किसी भी सहाबी ने उनके उत्तराधिकारी होने का दावा नही किया है।

संभव है कि कोई कहे कि पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की उम्र के अंतिम पलों में नमाज़ पढ़ाना दूसरे मौक़ों से अलग है, बल्कि अहले सुन्नत इन नमाज़ों के फ़र्क़ को बाक़ायदा मानते भी हैं और कहते हैं कि यह नमाज़ जो नबी सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के आख़िरी दिनों में पढ़ाई गई है इस का मामला एक तरह से अपने बाद उत्तराधिकारी व प्रतिनिधित्व का चुनाव करना था।

तो हम उनके जवाब में इस घटना की वास्तविकता के सत्य की खोज करने वालों के लिये पेश करेंगें और कहेंगे:

अगर ऐसा होता कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) ने अबू बक्र को नमाज़ पढ़ाने का हुक्म दिया होता तो वह ढेरों हदीसें जिसके अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम (स) ख़ुद बीमारी के बावजूद घर से मस्जिद में आये इस हाल में कि कुछ लोग आपको बग़ल से पकड़े हुए थे, आपके पैर ज़मीन पर खीच रहे थे और अबू बक्र को हटा कर आपने ख़ुद नमाज़ पढ़ाई।

अहले सुन्नत जवाब में कहते हैं: अबू बक्र काफ़ी मुद्दत से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की जगह पर नमाज़ पढ़ा रहे थे और केवल एक बार ऐसा हुआ जब आपने अबू बक्र को हटा कर ख़ुद नमाज़ पढ़ाई है।

हम इस बात का दो तरह से जवाब देते हुए कहना चाहेंगे:

1. अबू बक्र केवल एक बार पैग़म्बर (स) की जगह नमाज़ पढ़ाने के लिये खड़े हुए, वह भी सोमवार के दिन सुबह की नमाज़ के लिये, उसके अलावा ऐसा कभी पेश नही आया।

2. अगर यह भी फ़र्ज़ कर लिया जाये कि अबू बक्र पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की जगह पर बहुत बार नमाज़ पढ़ा चुके थे। अल्लाह के रसूल (स) का अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों में बीमारी के बावजूद घर से मस्जिद में आ कर नमाज़ पढ़ाना इस हाल में कि आपके पैर ज़मीन पर खीच रहे थे, आपका यह अमल (अबू बक्र हटा कर नमाज़ पढ़ाना) एक मज़बूत दलील है क्यों कि अगर आपने उन्हे अपने उत्तराधिकारी के तौर पर नियुक्त कर दिया था और यह बात सच थी तो इसका मतलब अब उन्हे अपदस्थ करके हटा दिया गया है।

अत: अगर स्वीकार कर लें कि पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने इस बात का आदेश दिया हो तो ऐसा है जैसे उन्हे मालूम था कि वह लोग उनके बाद इसी नमाज़ को दलील के तौर पर पेश करेंगे और उसे अबू बक्र के प्रतिनिधित्व व ख़िलाफ़त की मज़बूत दलील समझेंगे, इसलिये आप बीमारी के बावजूद घर से बाहर आये ताकि लोगों के दिमाग़ से यह बात साफ़ हो जाये।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का बीमारी के बिस्तर पर से उठ कर आना और अबू बक्र को किनारे कर देना, उन सारी हदीसों में जो अहले सुन्नत के अनुसार, अबू बक्र नबी (स) के हुक्म से नमाज़ पढ़ाने गये थे, मौजूद है।

आप इस किताब को अलहसनैन इस्लामी नैटवर्क पर पढ़ रहे है।

इस हदीस की ध्यान योग्य बातें

इस हदीस की जांच पड़ताल के सिलसिले में बहुत सी बातें ध्यान देने योग्य हैं जिन्हे हम यहां पर बयान करने जा रहे हैं:

पहला नुक्ता: जैसा कि बयान किया गया इन सारी हदीसों की रावी (नक़्ल करने वाली) आयशा हैं, उनके बयान के मुताबिक़ पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम इस हाल में घर से निकले कि दो लोग उन्हे सहारा दिये हुए थे और उनके पैर ज़मीन पर खीच रहे थे। आप (स) इस हालत में मस्जिद में आये और अबू बक्र को वहां से हटा कर ख़ुद नमाज़ पढ़ाई।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का बीमारी की हालत में निकलना इस बात की मज़बूत दलील है कि अगर आप (स) ने अबू बक्र को कोई पद दिया था तो अब उन्हे उससे अपदस्थ कर दिया है।

इस हदीस में आयशा ने उन दोनो लोगों में से, जो नबी (स) को सहारा दे कर मस्जिद में लाये थे, एक व्यक्ति के नाम ज़िक्र का किया है जबकि दूसरे की तरफ़ कोई इशारा नही किया गया है।

स्पष्ट है कि उन दो लोगों में से दूसरे अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस सलाम है। यह इंकार इस बात की निशानी है कि आयशा अली अलैहिस सलाम का नाम लेने और उन की फ़ज़ीलतों के बयान से नाराज़ थीं।

इब्ने अब्बास ने रावी से कहा: क्या आयशा ने दूसरे व्यक्ति का नाम तुम्हे बताया है? उसने कहा: नही।

इब्ने अब्बास कहते हैं: वह शख़्स अली अलैहिस सलाम थे, लेकिन आयशा को पसंद नही है कि वह उन्हे भलाई व नेकी के साथ याद करें।

दूसरा नुक्ता: जिस समय कुछ अहले सुन्नत इस बात को समझ गये कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का बीमारी व तबीयत ठीक न होने के बावजूद घर से निकलना और अबू बक्र को हटा कर नमाज़ पढ़ाना, अबू बक्र के लिये दी जाने वाली दलील की बुनियाद की जड़ की हिला देगा, इस लिये उन्होने एक ऐसी हदीस गढ़ी जिसके अनुसार पैग़म्बर (स) ने अबू बक्र को किनारे नही किया बल्कि आपने (स) मस्जिद में आने के बाद ख़ुद अबू बक्र की इमामत में नमाज़ पढ़ी।

उन लोगों ने इस हदीस को गढ़ कर अपने ऐतेबार से अबू बक्र के प्रतिनिधित्व को साबित बल्कि मज़बूत कर दिया, दूसरे शब्दों में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने न केवल जबान से अबू बक्र को नमाज़ पढ़ाने का हुक्म दिया बल्कि अमली तौर पर भी उनके पीछे नमाज़ पढ़ कर उन्हे अपने बाद ख़लीफ़ा के तौर नियुक्त कर दिया, क्योंकि उस बीमाकी की हालत में आप मस्जिद में आये और अबू बक्र के पीछे नमाज़ पढ़ी।

अब इस हदीस के बाद कौन नबी (स) के बाद अबू बक्र के प्रतिनिधित्व व ख़िलाफ़त के बारे में बहस कर सकता है जबकि ख़ुद पैग़म्बर सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने नमाज़ में उनकी पैरवी की? क्या यह हदीस अबू बक्र की ख़िलाफ़त पर मज़बूत दलील बनने के लिये काफ़ी नही है?

हां, निसंदेह वह झूठी और गढ़ी हुई हदीसों के ज़रिये यह कह सकते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने अपनी ज़िन्दगी की आख़िरी नमाज़ अबू बक्र की इमामत में पढ़ी है, लेकिन हदीस का यह भाग सही मुस्लिम और सही बुख़ारी में मौजूद नही है और जो कुछ इल दोनों किताबों में आया है वह यह है कि अल्लाह के रसूल (स) ने अबू बक्र को किनारे किया या अबू बक्र ख़ुद से किनारे हो गये और नबी (स) के पीछे खड़े हो गये और पैग़म्बर (स) ने नमाज़ पढ़ाई।

यह झूठी और गढ़ी हुई हदीस मुसनदे अहमद बिन हंबल में मौजूद है और शत प्रतिशत झूठी है और अहले सुन्नत के बहुत से उलामा व हाफ़िज़ो ने इस का इंकार किया है, यहां तक कि उन में से कुछ जैसे हाफ़िज़ अबिल फ़र्ज इब्ने जौज़ी ने इस हदीस के असत्य होने के बारे में अलग एक किताब लिखी है।

वास्तव में क्या अक़्ल इस बात को स्वीकार करती है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने अपनी उम्मत के एक व्यक्ति की पैरवी की हो और वह पैग़म्बर (स) का इमाम बन गया हो? स्पष्ट है कि अक़्ल कभी भी बात को स्वीकार नही कर सकती है।

तीसरा नुक्ता: पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम नमाज़ के लिये घर से निकले और अबू बक्र को हटा तक ख़ुद नमाज़ पढ़ाई और इसी पर नही रुके बल्कि नमाज़ के बाद मिम्बर पर गये और लोगों के सामने एक ख़ुतबा पढ़ा और इस ख़ुतबे में पवित्र क़ुरआन और अपने अहले बैत अलैहिमुस सलाम का परिचय कराया और लोगों को आदेश दिया कि उन दोनों की पैरवी करें और अपने कार्यों के सिलसिले में उन दोनो का अनुसरण करें।

अत: पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम का नमाज़ के लिये आना और अबू बक्र को किनारे करना इस लिये था कि आप अपने पवित्र जीवन के अंतिम क्षणों में भी ख़ुतबे के ज़रिये से लोगों के अपने अहले बैत (अ) के बारे में वसीयत करें और एक बार फिर से अपने बाद होने वाले उत्तराधिकारी की परिचय करायें।

आप (स) ने ख़ुतबे के बाद सारे मुसलमानों को आदेश दिया कि ओसामा के साथ मदीने से बाहर निकल जायें और इस बात पर ज़ोर दिया कि लोग ओसामा की फौज के शामिल हो जायें और इस काम में जल्दी करें।

क्या वास्तव में इन सारी दलीलों के बाद भी कोई रास्ता रह जाता है कि इस हदीस से अबू बक्र के नमाज़ पढ़ाने पर दलील पेश की जा सके।

 

सातवीं दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

उनकी सातवीं दलील पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की वह हदीस है जिस में आपने फ़रमाया:

मेरी उम्मत में सर्वश्रेष्ठ व सर्वोच्च अबू बक्र व उमर है।

इस हदीस को इन ही शब्दों के साथ क़ाज़ी ऐजी और उसके व्याखक और दूसरे लोगों ने नक़्ल किया है, जबकि यह हदीस इतनी ही नही है बल्कि इसके आगे भी है लेकिन उन्होने उसके बाद का हिस्सा बयान नही किया है ताकि अपने दलील पेश करने को पूर्ण कर सकें। हदीस में आने वाले सम्पूर्ण वाक्य इस तरह से हैं:

عن عائشۃ قلت یا رسول اللہ من خیر الناس بعدک؟

قال: ابو بکر

قلت: ثم من

قال: عمر

आयशा कहती हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से पूछा: ऐ अल्लाह के नबी, आपके बाद लोगों में सबसे बेहतर इंसान कौन है?

आपने फ़रमाया: अबू बक्र

मैंने कहा: उनके बाद कौन सर्वश्रेष्ठ है?

आपने फ़रमाया: उमर

यह हदीस का वही भाग है जिसे अहले सुन्नत दलील बना कर पेश करते हैं जबकि उस जगह पर हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाहे अलैहा भी मौजूद थीं। उन्होने अपने वालिद से सवाल किया कि ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम) अली के बारे में क्यों कुछ नही फ़रमाते? तो आपने फ़रमाया:

یا فاطمۃ علی نفسی، فمن رایتیہ یقول فی نفسہ شیئا؟

ऐ फ़ातेमा, अली मेरा नफ़्स है, तुमने किसी को देखा है कि कोई अपने बारे में ख़ुद कुछ कहता है।

अत: अहले सुन्नत इस हदीस के पहले भाग से जिसमें अबू बक्र व उमर के नाम आया है, दलील पेश करते हैं और इसे उनके प्रतिनिधित्व के बारे में दलील बनाते हैं लेकिन उसके बाद के भाग का कोई वर्णन नही करते। ऐसे जैसे किसी को इस हदीस के बारे में कभी ख़बर ही नही होगी और कभी कोई इस हदीस को देख भी नही सकता है और उसके स्रोत को भी पैदा नही कर सकता है।

इन सारी बातों के बावजूद यह हदीस सनद के ऐतेबार से ज़ईफ़ (अविश्वस्त) है। इस बारे में ज़्यादा जानकारी के लिये किताब तंज़ीहुश शरीय्यतिल मरफ़ूआ अनिल अदाहीसिस शियातिल मौज़ूआ का अध्धयन करें।

 

आठवीं दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

अहले सुन्नत की आठवीं दलील पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम यह हदीस है जिस में आपने फ़रमाया:

لو کنت متخذا خلیلا دون ربی لاخذت ابا بکر

अगर मैं अपने ईश्वर के अलावा किसी को अपना मित्र बनाना चाहता तो निसंदेह मैं अब बक्र को अपना दोस्त चुनता।

इस हदीस के जवाब में इतना कह देना काफ़ी है कि अगर यह हदीस अबू बक्र के बारे में बयान हुई है और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने उन्हे अपनी दोस्त बनाया है तो उस हदीस के बारे में क्या कहेंगे तो जो उस्मान के बारे में ख़ुद अहले सुन्नत ने अल्लाह के रसूल (स) से उस्मान के बारे में नक़्ल की है कि अल्लाह के नबी (स) ने उस्मान के बारे में भी इसी तरह से फ़रमाया है और उन्हे अपना दोस्त बनाया है, वास्तव में अबू बक्र से संबंधित हदीस में आया है कि पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर, जबकि उस्मान के बारे में आया है कि पैग़म्बर (स) उन्हे अपना दोस्त बनाया है वह हदीस इस तरह है:

ان لکل نبی خلیلا من امتہ و ان خلیلی عثمان بن عفان

हर नबी अपनी प्रजा में से एक व्यक्ति को अपना मित्र व दोस्त बनाता है और निसंदेह मेरे मित्र उस्मान बिन अफ़्फ़ान हैं।

अत: इस हदीस के अनुसार उस्मान, अबू बक्र से श्रेष्ठ व उत्तम साबित हो जायेंगे।

हां, मेरा मानना भी यही है कि अहले सुन्नत के यहां पाये जाने वाले सुबूतों के आधार पर उस्मान अबू बक्र व उमर से श्रेष्ठ व बेहतर हैं, इस लिये कि उनकी किताबों में उस्मान की शान व प्रशंसा में ऐसी हदीसें बयान हुई हैं जिनसे यह बात साबित होती है, जैसे एक यही हदीस जो ऊपर पेश की गई हैं, लेकिन यह सारी हदीसें असत्य व बेबुनियाद हैं।

 

नवीं दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

अहले सुन्नत की नवीं दलील यह हदीस है जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने अबू बक्र के बारे में बयान फ़रमाई है:

و این مثل ابی بکر کذبنی الناس و صدقنی و آمن بی و ۔۔۔۔۔ و واسانی بنفسہ و جاھد معی ساعۃ الخوف

अबू बक्र जैसा व्यक्ति कहां मिलेगा जिस समय में लोग मुझे झुटलाते थे उन्होने मेरी सत्यता की गवाही और मुझ पर ईमान लाये .... और अपनी जान और दौलत से मेरी सहायता की, जंग के अकेले पन और डरावने वातावरण में मेरा साथ दिया और मेरे साथ जंग में शरीक रहे।

सुयूती अपनी किताब अल लआलिल मसनूआ बिल अहादिसिल मौज़ूआ और हाफ़िज़ इब्ने अर्राक़ किताब तंज़ीहुश शरीया के लेखक ने अपनी किताबों में इस हदीस को झूठी और जाली हदीस लिखा है।

यह हदीस दलालत के लिहाज़ से भी इस बात को साबित करना चाहती है कि अबू बक्र अपने माल में से पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम को दिया करते थे और अपने ज़ाती चीज़ों में से आप (स) को दिया करते थे और अल्लाह के नबी (स) को अबू बक्र के माल व दौलत और उनकी बख़्शिश की आवश्यकता थी।

स्पष्ट है कि यह सारी बातें गढ़ी हुई और झूठी है और इनका जाली और फ़र्ज़ी होना इसका ज़्यादा साफ़ है कि इब्ने तैमिया जैसे लोग भी इस बात पर मजबूर हो गये कि इसके झूठे और ग़लत होने को स्वीकार करें और पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम को अबू बक्र के पैसे और दौलत की कोई आवश्यकता नही थी।

आश्चर्य जनक है कि इन हदीसों के गढ़ने वाले इस तरह से अच्छाईयों और विशेषताओं को अपने आक़ाओं के लिये जोड़ तोड़ रहे हैं कि उसके लिये वह इस पर बात पर भी विचार करने को तैयार नही है कि इससे पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की तौहीन होती है।

अत: जो कुछ भी बयान किया गया उससे इस हदीस के सनद और दलालत दोनों के ऐतेबार से झूठा होना साबित हो जाता है।

 

दसवीं दलील की समीक्षा व जांच पड़ताल

दसवी दलील वह हदीस है अली अलैहिस सलाम से अबू बक्र व उमर की फज़ीलत में नक़्ल हुई है उसमें इस तरह से आया है:

اقیلونی فلست بخیرکم ۔

ख़िलाफ़त के कामों के लिये मुझे न चुना जाये क्यों कि मैं तुम सब में सर्वश्रेष्ठ नही हूं।

नबियों और पैग़म्बरों के बाद अबू बक्र सर्वेश्रेष्ठ इंसान हैं और उनके बाद उमर सर्वोच्च हैं, उन दोनो के बाद कौन है उसका ज्ञान ईश्वर के पास है।

इस हदीस का वर्णन केवल इन ही शब्दों के साथ नही हुआ है बल्कि उन लोगों ने इस हदीस को विभिन्न प्रकार से अबू बक्र व उमर के बारे में नक़्ल किया है।

हम इस हदीस का दो तरह से उत्तर देंगे:

1. अबू बक्र ख़ुद इस बात को स्वीकार करते थे कि वह लोगों में सर्वश्रेष्ठ नही हैं क्या उन्होने नही कहा कि मैं तुम्हारा ख़लीफ़ा बन गया हूं लेकिन मैं तुम लोगों से बेहतर नही हूं। क्या वह इस तरह से नही कहते थे:

ख़िलाफ़त के कामों के लिये मुझे न चुना जाये क्यों कि मैं तुम सब में सर्वश्रेष्ठ नही हूं।

यह हदीस भी बहुत से स्रोतों में नक़्ल हुई है।

2. किताब अल इसतीआब के लेखक अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की जीवनी, इब्ने हज़म अपनी किताब अल फ़स्लो फ़िल मेलल वन नेहल और अहले सुन्नत के बहुत से दूसरे बुज़ुर्गों ने इस बात को नक़्ल किया है:

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बहुत से सहाबी हज़रत अली अलैहिस सलाम को अबू बक्र से सर्वश्रेष्ठ व सर्वोच्च मानते थे।

अत: अगर ख़ुद अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम इस बात को स्वीकार करें कि अबू बक्र व उमर उन से बेहतर व उत्तम हैं तो किस तरह से बहुत से सहाबी अली को अबू बक्र से सर्वोच्च समझते व मानते थे?

हां, उन लोगों ने उन में से कुछ का ज़िक्र किया है जो यह कहते थे कि अली अलैहिस सलाम सर्वश्रेष्ठ हैं। जैसे अबूज़रे ग़फ़्फ़ारी, सलमाने फ़ारसी, मिक़दाद, अम्मारे यासिर व ..... उस गिरोह का भाग हैं। इसके बावजूद अली अलैहिस सलाम स्वीकार करतें हैं कि अबू बक्र व उमर उन से श्रेष्ठ हैं।। यह वह हदीसें हैं जो अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के नाम से गढ़ी गई हैं।

अत: वह सारी हदीसें जिन्हे अहले सुन्नत दलील के तौर पर पेश करते हैं, उन मे हमने एक भी सही व सालिम हदीस नही पाई, जिस में कोई शक व शंका न हो। यह सारी दलीलें जो वह लाये हैं, ख़ुद उनके स्रोतों और उनके हदीस शास्त्रियों के अनुसार, या तो सनद के ऐतेबार से कमज़ोर हैं या फिर दलालत के ऐतेबार से अपूर्ण व असम्पूर्ण हैं।

लिहाज़ा यह सारी हदीसें गढ़ी हुई और जाली हैं जो ख़ुद उनकी स्वीकृति के अनुसार खोखली और बेबुनियाद हैं। विशेष कर वह हदीस जिस में आया है कि मेरे बाद अबू बक्र व उमर की पैरवी करें।

संक्षिप्त यह कि उनकी सबसे महत्वपूर्ण दलील अबू बक्र का नबी (स) की जगह नमाज़ पढ़ाना है जिसमें आया है कि पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के जीवन के अंतिम पलों में उनकी जगह अबू बक्र का नमाज़ पढ़ाना उनके प्रतिनिधित्व की दलील है लेकिन वह बातें जो कहीं गई उनके हिसाब से पैग़म्बर (स) ने अबू बक्र को वहां से हटा कर ख़ुद नमाज़ पढ़ाई। यह हदीस उस समय सही और विश्वास योग्य हो सकती है कि जब अबू बक्र का नमाज़ के लिये भेजा जाना सही व साबित हो।

जब कि अबू बक्र व उमर के प्रतिनिधित्व के बारे में दूसरे रास्तों से भी बहस होनी चाहिये और वह यह है कि इन दोनों की ख़िलाफ़त के ज़माने की वह घटनाएं हुई हैं जो उन्हे मुसलमानों का ख़लीफ़ा होने से रोक सकती हैं और इस तरह की घटनाएं इतिहास के पन्नों में भरी पड़ी और बहुत सी किताबों में दर्ज हैं। लेकिन यह हमारा तरीक़ा नही है कि हम ऐसी हदीसों के बारे में बहस करें।

 

चौथा हिस्सा

समीक्षा व जांच पड़ताल

इजमा (एकमत) आधारित दलील

अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर इजमा (एकमत) आधारित दलील की समीक्षा व जांच

अब बक्र के प्रतिनिधित्व पर अहले सुन्नत की ओर से पेश की जाने वाली एक दलील जो अभी तक इस किताब में होने वाली समीक्षा व जांच से बची हुई है वह इजमा (एकमत होना) यानी सारे सहाबियों का अबू बक्र की ख़िलाफ़त पर सहमत हो जाना है।

सत्य व हक़ की खोज करने वाले अध्धयन कर्ताओं इस दलील से भी अच्छी तरह से परिचित हैं कि अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर किस तरह से इजमा (एकमत हो जाना) घटित हुआ है और उचित नही है कि हम इस बहस में प्रवेश करें क्यों कि फिर ना चाहते हुए भी यह बहस उन घटनाओं की तरफ़ चली जायेगी। जिसका वर्णन हम लेख में नही करना चाहते। लेकिन जिस सीमा तक यह लेख आज्ञा देगा, हम समीक्षा व जांच पड़ताल करेंगे और इसका प्रारम्भ हम इस प्रश्न के उत्तर से करना चाहेंगे:

वास्तव में वह लोग अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में किस प्रकार के इजमा (एकमत) व सहमति का दावा करते हैं?

वह लोग कहते हैं कि सक़ीफ़ ए बनी सायदा में कुछ घटनाएं इस तरह से घटीं कि एक समूह ने जो वहां पर जमा था, उन्होने ने अबू बक्र को ख़लीफ़ा चुन कर उनके हाथ पर बैअत कर ली और उन्हे जनता के सामने ख़लीफ़ा बना कर पेश कर दिया।

इस दलील के बारे में किताब शरहुल मक़ासिद के लेखक, जो धर्म शास्त्र के बहुत ज्ञानी हैं, उनके कथन का वर्णन कर देना काफ़ी है वह लिखते हैं:

हम जब कहते हैं कि अबू बक्र के प्रतिनिधित्व पर इजमा व सहमति बन चुकी है तो इससे हमारी मुराद वास्तविक व सच्चा इजमा नही होता। क्योंकि हमारा मानना है कि अबू बक्र के अलावा भी कुछ दूसरे लोगों पर इजमा व सहमति पाई जाती थी और ऐसा नही है कि अबू बक्र के प्रतिनिधित्व से सारे लोग प्रसन्न व ख़ुश थे बल्कि सच्चाई यह है कि मुहाजेरीन व अंसार के आपसी झगड़े और अंसार के दो गिरोह औस व ख़ज़रज की रंजिश के बाद सक़ीफ़ा में अकेले उमर की बैअत से इसकी शुरुवात हुई। इस बात की तरफ़ इतना इशारा कर देना पर्याप्त है।

जबकि अहले सुन्नत इसके बावजूद कि वह जानते हैं कि कई गिरोह अबू बक्र की ख़िलाफ़त के विरोधी थे, अपनी किताबों में यह सब पढ़ने के बाद लिखते हैं कि बेहतर है कि इन बातों के बारे में कुछ कहने से बचा जाये। क्योंकि पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम ने सहाबियों के आपसी इख़्तेलाफ़ के बारे में चुप रहने का आदेश दिया है। अत: इस तरह की बहसों में पड़ने की कोई आवश्यकता नही है।

यहां पर उचित होगा कि हम सअद तफ़ताज़ानी के कथन को पेश करें जो उन्होने अपनी किताब शरहुल मक़ासिद में पेश किया है ता कि यह पता चल सके कि किस तरह से वह लोग घबराहट का शिकार हैं और कहां पर पनाह की तलाश कर रहे हैं।

सअद तफ़तज़ानी इस तरह से लिखते हैं:

अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में सारे मुसलमान बुद्धिजीवि व ज्ञानी एकमत व एक राय हैं और उन सब के बारे में अच्छा गुमान कर लेने से यह बात समझ में आती है कि अगर इस चीज़ के बारे में उन सब को स्पष्ट दलील के ज़रिये अध्यात्म न होता तो कभी भी वह सब के सब अबू बक्र की ख़िलाफ़त से सहमति ज़ाहिर न करते।

हम उनका बात का इस तरह से उत्तर देंगे:

अगर अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में इस तरह से कहना पड़े तो हम मजबूर हैं कि कहें कि हमने अच्छे गुमान (हुसने ज़न) के कारण पैग़म्बरे अकरम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के सहाबियों की तक़लीद व पैरवी की है और अगर अनुसरण व तक़लीद की बात सामने आती है फिर तो हमें ख़ुद को कष्ट व पीड़ा में डालने और पवित्र क़ुरआन व हदीसों से इस बारे में बहस की कोई आवश्यकता ही नही है बल्कि हमें बहस के शुरु में ही यह कह चाहिये कि हमने इस मामले में पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के सहाबियों का अनुसरण किया है। उन्होने ऐसा किया था इस लिये हम भी उनकी पैरवी करते हुए उनके रास्ते पर चल रहे हैं।

तफ़तज़ानी आगे लिखते हैं:

पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के सहाबियों के सम्मान की रक्षा करना चाहिये और उन्हे ताना देने और उनकी कमियां निकालने से बचना चाहिये और वह हदीसें जिन से उनकी बुराई का पहलु सामने आता है उनकी व्याख्या करनी चाहिये और उनके ग़ैर स्पष्ट अर्थ को बयान करना चाहिये। विशेष कर वह हदीसें जो मुहाजेरीन व अंसार सं संबंध रखती हैं, उनकी व्याख्या होनी चाहिये।

 

शियों की ओर से दी जाने वाली दलीलों के बारे में तफ़तज़ानी का कथन

सअद तफ़तज़ानी ने अपनी किताब में शियों के कथनों का वर्णन किया है वह लिखते हैं:

वह लोग कहते हैं कि पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के अली अलैहिस सलाम के सिवा कोई ख़लीफ़ा नही है। इस लिये कि ख़लीफ़ा व इमाम में कुछ शर्तों का पाया जाना अनिवार्य है जैसे गुनाह से मासूम होना, अल्लाह के रसूल (स) सिफ़ारिश करना और सर्वश्रेष्ठ होना और अली अलैहिस सलाम के सिवा किसी और सहाबी में यह सारी शर्तें नही पाई जाती हैं।

वह इस बात को नक़्ल करने के पश्चात शियों के महान शोधकर्ता शैख़ ख़्वाजा नसीरुद्दीन तूसी और दूसरे उलमा पर हमला बोलते हुए उन सब को बुरा भला और उनकी बेइज़्ज़ती करते हैं। हम यहां पर उनके शब्दों को पेश कर रहे हैं ता कि वास्तविकता की खोज लगाने वाले उनके बुद्धि, समझ और सभ्यता से परिचित हो जायें और उनके कथन का शिया उलमा के कथनों से मुक़ाबला करें।

सअद तफ़तज़ानी इस तरह से लिखते हैं:

احتجت الشیعۃ بوجوہ لھم فی اثبات امامۃ علی بعد النبی من العقل والنقل، والقدح فیما عداہ من اصحاب رسول اللہ الذین قاموا بالامر۔ ویدعون فی کثیر من الاخبار الواردۃ فی ھذا الباب التواتر، بناء علی شھرتہ فیما بینھم، و کثرۃ دورانہ علی السنتھم، و جریانہ فی اندیتھم، و موافقۃ لطباعھم، ومقارعتہ لاسمائھم۔

ولا یتاملون کیف خفی علی الکبار من الانصار والمھاجرین، والثقات من الرواۃ والمحدثین، و لم یحتج البعض علی البعض، و لم یبرموا علیہ الابرام والنقص۔

و لم یظھر الا بعد انقضاء دور الامامۃ و طول العھد بامر الرسالۃ، و ظھور التعصبات الباردۃ، والتعسفات الفاسدۃ، و افضاء امر الدین الی علماء السوء، الملک الی امراء الجور، و من العجائب ان بعض المتاخرین من المتشغبین، الذین لم یروا احدا من المحدثین و لا رووا حدیثا فی امر الدین، ملووا کتبھم من امثال ھذہ الاخبار والمطاعن فی الصحابۃ الاخیار، و ان شئت فانظر فی کتاب التجرید المنسوب الی الحکیم نصیر الدین الطوسی، کیف نصر الاباطیل و قرر الاکاذیب ۔

शिया अली अलैहिस्सलाम की इमामत व ख़िलाफ़त को साबित करने के बारे में कई तरह से अक़्ली व हदीसों से दलील पेश करते हैं और पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बाद जिन लोगों ने शासन को अपने हाथ में लिया था उन सब को ताना मारते हैं और उन सब में ढेरों बुराइयां और कमियां निकालते हैं, यहां तक कि इस बारे में बयान होने वाली बहुत सी हदीसों के बारे में तवातुर (जिसके नक़्ल करने वाले बहुत ज़्यादा हों) का दावा करते हैं।

क्योंकि यह हदीसें उन के दरमियान प्रसिद्धी प्राप्त कर चुकी हैं और हर ज़माने में यह हदीसें उनकी ज़बानों पर जारी रहीं हैं और उनकी अंदरुनी तबीयत से मेल खाती हैं और वह हमेशा यह तअनें और बुराइयों सुनते रहे हैं, लेकिन उन्होने कभी विचार नही किया कि किस तरह से यह बुराइयां मुजाहिर व अंसार के बुज़ुर्गों और हदीस शास्त्रीयों से जो सबके सब विश्वास पात्र थे, छिपी रह गई और उनमें से कभी किसी ने वह एक दूसरे के विरोध में पेश नही कीं और वह चीज़ जो इनके सही होने या सही न होने पर दलालत करती हैं, उनको बयान नही किया है।

यह तअने और बुराइयां उस समय से आरम्भ हुए जब उनकी ख़िलाफ़त व प्रतिनिधित्व का ज़माना ग़ुज़र गया और उनके अन्याय व असत्यता स्पष्ट हुईं और धार्मिक गतिविधियां अशिष्ट उलामा और जनता पर राज अत्याचारी शासकों के हाथों में पहुच गया।

आश्चर्य जनक है कि उनका एक धर्म गुरु, जो लड़ाई झगड़े वाला और उन लोगों में से था जिसने ऐसा लगता है जैसे किसी हदीस शास्त्री को नही देखा है और न ही कोई हदीस किसी से प्राप्त की है, उसने अपनी किताबों में इस तरह की हदीसों और कथनों से, पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के भले सहाबियों पर तअनों व बुराइयों से भर दिया है। अब अगर आप चाहें तो किताब अत तजरीद का अध्धयन कर लें, जो नसीरुद्दीने तूसी ने लिखी है, और देख लें कि किस तरह से उसने बातिल व असत्य लोगों की हिमायत और झूठी बातों की नियुक्ति की है।.....)

 

तफ़तज़ानी के कथन की समीक्षा व जांच

हम तफ़तज़ानी के उत्तर में इस तरह से कहेंगे:

हम तफ़तज़ानी को धन्यवाद कहेंगे कि उन्होने ख़्वाजा नसीरुद्दीने तूसी रहमतुल्लाह अलैह को इतना ही बुरा भला कहने को पर्याप्त समझा, क्यों कि इब्ने तैमीया इस कारण से कि ख़्वाजा ने अपनी किताब तजरीदुल ऐतेक़ाद में अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की ख़िलाफ़त पर अहले सुन्नत की किताबों से दलीलें दी हैं, इब्ने तैमिया ने उनकी तरफ़ ऐसी बातों की निस्बत दी है कि कोई मुसलमान किसी पस्त श्रेणी के इंसान के बारे में भी ऐसी निस्बत नही दे सकता और ऐसे बड़े गुनाहों को उनकी तरफ़ मंसूब किया हैं जिसका यहां पर वर्णन नही किया जा सकता है।

 

अंतिम बात

इस विषय की बुनियाद यह है कि हमने कुछ पत्रिकाओं में जो ऐतेक़ादी विषयों पर शोध के सिलसिलों से जुड़ी हुई हैं, इमाम अली अलैहिस सलाम की इमामत व ख़िलाफ़त के बारे में अहले सुन्नत की किताबों से दलीलें पेश कीं और ख़ुद उनकी किताबों से उन दलीलों के सही होने को साबित किया और सारी दलीलों को शिष्टता व सभ्यता के साथ पेश किया और अहले सुन्नत के किसी आलिम की शान में गुस्ताख़ी व बे अदबी नही की। अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम के प्रतिनिधित्व को पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम की विश्वस्त व मोतबर हदीसों से उनके मासूम होने, सारे सहाबियों में सर्वश्रेष्ठ होने को साबित किया है।

यह सारी दलीलें ख़ुद अहले सुन्नत की प्रसिद्ध किताबों और उनके उलमा के दृष्टिकोणों पर आधारित हैं और हरगिज़ कहीं किसी बेजा बुराई और सख़्ती से काम नही लिया गया है।

उनके बाद अब इस किताब में अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में अहले सुन्नत की दलीलों की समीक्षा व जांच पड़ताल की है जैसा कि उन्होने कहा कि इस बारे में पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम से अलग से कोई हदीस नक़्ल नही हुई है। इजमा (एकमत होना) और सहमति के बारे में भी बड़ी मुश्किल और मजबूरी में इस बात को स्वीकार करते हैं कि ऐसी कोई सहमति नही बन सकी है।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण दलील अबू बक्र को सारे सहाबियों से सर्वश्रेष्ठ होना था, की भी समीक्षा व जांच पड़ताल की गई और उनकी सारी किताबों में उसके सम्पूर्ण होने को बयान किया।

वास्तव में हमारा पाप क्या है यही कि अबू बक्र के प्रतिनिधित्व के बारे में उनकी दलीलें अपूर्ण व अधूरी और अमीरुल मोमिनीन अलैहिस सलाम की इमामत व ख़िलाफ़त के बारे में दी जाने वाली हमारी दलीलें जो उनकी किताबों से हैं और पूर्ण व सम्पूर्ण हैं

क्यों वह लोग वास्तविकता व सच्चाई के साथ बहस नही करते?

क्यों सच्चाई व वास्तविकता कड़वी हो जाती है?

क्यों वह लोग बुराई व गाली गलौज की पनाह में चले जाते हैं?

क्यों वह लोग शिया उलमा पर अपनी बातों से हमले करते हैं?

क्या इस्लाम के शुरु से लेकर आज तक शिया उलमा को गालियां देना, उनकी बुराइयां करना, वध करना व जेलों में डालना उनके लिये काफ़ी है?

कब तक वह ऐसा करना जारी रखेंगे?

वह लोग ऐसा क्यों करते हैं?

हम सच्चाई के साथ बहस करना चाहते हैं और जानना चाहते हैं कि पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बाद किसका अनुसरण करें ता कि उसे अपने धर्म, ज्ञान, अहकाम व आदेशों में अपने और अल्लाह के दरमियान वास्ता व वसीला बना सकें।

हम चाहते हैं कि सच्चाई को अपने लिये स्पष्ट करें ताकि अपने ईश्वर से इस तरह के कह सकें:

ऐ मेरे अल्लाह, हमने दलीलों में ग़ौर व विचार किया और सच्चाई जानने का प्रयत्न किया और इस नतीजे पर पहुचे कि यह शख़्स पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के बाद हमारा इमाम व मार्गदर्शक है और हम इम मासूम (निष्पाप) मार्गदर्शक के ज़रिये से तुझ से नज़दीक हो सकते हैं और तुझ से संबंध स्थापित कर सकते हैं। हमें आशा है कि हमारा यह शोध स्वीकार्य बहाने के तौर पर अल्लाह के यहां स्वीकार हो जाये।

अत: जो कुछ हमने समीक्षा व जांच पड़ताल की, यह सब दोस्ती व दुश्मनी के लिये थी, इस बहस को करने में हमारी कोई ग़रज़ व फ़ायदा शामिल नही था और हमें बुराई करने और गाली गलौज करने की कोई आवश्यकता नही है।

सच में क्या इन सबके बा वजूद सच्चाई कड़वी बनी रहेगी?

कब तक वह हक़ को स्वीकार नही करेंगे और उसकी पैरवी नही करेंगे?

क्या वह लोग गाली गलौज करते हैं क्या पस्त और नादान लोगों के अलावा कोई इस तरह से बात करता है?

सर्व शक्ति ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमें तौफ़ीक़ दे कि हम उसकी ख़ुशी को प्राप्त कर सकें। ईश्वर से दुआ है कि वह हमारा मार्गदर्शन करे ता कि हम वास्तविकता को पा सकें और उस पर अमल कर सकें और हक़ व सत्य का अनुसरण करने वाले बन जायें। हम उससे अनुरोध करते हैं कि उससे मुलाक़ात के दिन और पैग़म्बर इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम के सामने जाते समय हमारा चेहरा प्रकाशमय व सफ़ेद हो जाये।

अल्लाह की तरफ़ से दुरुद व सलाम हो पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिहि वसल्लम और उनके पवित्र ख़ानदान पर।

 

 

 

स्रोत

1.   क़ुरआने करीम

2.   अल इस्तीआब, इब्ने अब्दुल बर, प्रसारक दारुल कुतुब इल्मिया, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन वर्ष 1415 हिजरी क़मरी।

3.   असनल मतालिब फ़ी अहादिसा मुख़्तलफ़तिल मरातिब, इब्ने दरवेश हूत, प्रसारक मकतबतुल तेजारियतिल कुबरा, मिस्र, पहला एडिशन, वर्ष 1355 हिजरी क़मरी।

4.   तारीख़े बग़दाद, ख़तीबे बग़दादी, प्रसारक दारुल कुतुब इल्मिया, बैरूत, वर्ष 1417 हिजरी क़मरी।

5.   तारिख़ुल ख़ुलफ़ा, जलालुद्दीने सुयूती, शरीफ़ रज़ी प्रेस, क़ुम, ईरान, पहला एडिशन, वर्ष 1411 हिजरी क़मरी।

6.   तारीख़े मदीन ए दमिश्क़, इब्ने असाकर, प्रसारक दारुल फ़िक्र, बैरूत, लेबनान, वर्ष 1415 हिजरी क़मरी।

7.   तलख़ीसुल मुसतदरक, ज़हबी, प्रसारक दारुल मारेफ़त, बैरूत, लेबनान।

8.   तहज़ीबुत तहज़ीब, इब्ने हजरे असक़लानी, प्रसारक दारुल कुतुब इल्मिया, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1415 क़मरी।

9.   तंज़ीहुश शरीयतिल मरफ़ूआ अनिल अहादिस शनीयातिल मौज़ूआ, इब्ने अर्राक़ कनानी, प्रसारक दारुल कुतुब इल्मिया, बैरूत, लेबनान, दूसरा एडिशन, वर्ष 1401 हिजरी क़मरी।

10.  सोनने तिरमिज़ी, तिरमिज़ी, प्रसारक दारुल फ़िक्र, बैरूत, दूसरा एडिशन, वर्ष 1403 हिजरी क़मरी।

11.  सीरए इब्ने हेशाम, इब्ने हेशाम, दार अहयाइत तुरासिल अरबी, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1415 हिजरी क़मरी।

12.  शरहुल मक़ासिद, तफ़तज़ानी, शरीफ़ रज़ी प्रेस, क़ुम, ईरान, पहला एडिशन, वर्ष 1409, दारुल मआरिफ़े नोमानिया, पाकिस्तान, पहला एडिशन, वर्ष 1401 हिजरी क़मरी।

13.  शरहुल मिनहाज, (हस्तलिपि) अबरी फ़ुरक़ानी।

14.  शरहुल मवाक़िफ़, सैयद शरीफ़ अल जुरजानी व हाशिया अस सियालकोटी व हलबी, शरीफ़ रज़ी प्रेस, क़ुम, ईरान, पहला एडिशन, वर्ष 1412 हिजरी क़मरी।

15.  सही बुख़ारी, बुख़ारी, प्रसारक दारुल फ़िक्र, बैरूत, वर्ष 1401 हिजरी क़मरी।

16.  सही मुस्लिम, मुस्लिम नैशापुरी, प्रसारक दारुल फ़िक्र, बैरूत, लेबनान।

17.  अज़ ज़ुआफ़ाउल कबीर, उक़ैली, प्रसारक दारुल कुतुब इल्मिया, बैरूत, लेबनान।

18.  अत तबक़ातुल क़ुबरा, इब्ने सअद, प्रसारक दारुल क़ुतबिल इल्मिया, बैरूत, लेबनान, दूसरा एडिशन, वर्ष 1418 हिजरी क़मरी।

19.  फ़तहुल बारी, इब्ने हजर, प्रसारक दारुल कुतुबिल इल्मिया, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1410 हिजरी क़मरी।

20.  अल फ़सलो फ़िल अहवाए वल मेलले वन नेहल, इब्ने हज़म अंदलुसी, प्रसारक दारुल कुतुबिल इल्मिया, बैरुत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1416 हिजरी क़मरी।

21.  फ़ैज़ुल क़दीर, मनावी, दारुल कुतुबिल इल्मिया, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1415 हिजारी क़मरी।

22.  अल कामिल, अब्दुल्लाह अदी, प्रसारक दारुल फ़िक्र, बैरूत, लेबनान, तीसरा एडिशन, वर्ष 1409 हिजरी क़मरी।

23.  कंजुल उम्माल, मुत्तक़ी हिन्दी, प्रसारक दारुल रिसालह, बैरूत, लेबनान, वर्ष 1409 हिजरी क़मरी।

24.  अल लआलिल मसनूआ फ़िल अहादिसिल मौज़ूआ, जलालुद्दीन सुयूती, प्रसारक दारुल कुतुबिल इल्मिया, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1417 हिजरी क़मरी।

25.  लेसानुल मीज़ान, इब्ने हजरे असक़लानी, प्रसारक आलमी संस्था, बैरूत, लेबनान, दूसरा एडिशन, वर्ष 1390 हिजरी क़मरी।

26.  मजमउज़ ज़वायद व मम्बउल फ़वायद, हैसमी, प्रसारक दारुल फ़िक्र, बैरूत, लेबनान, वर्ष 1412 हिजरी क़मरी।

27.  अल मुसतदरक, हाकिम नैशापुरी, प्रसारक दारुल कुतुबिल इल्मिया, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1411 हिजरी क़मरी।

28.  मुसनदे अहमद बिन हंबल, अहमद बिन हंबल, प्रसारक दारु अहयाइत तुरासिल अरबी व दार सादिर, बैरूत, लेबनान, तीसरा एडिशन, वर्ष 1415 हिजरी क़मरी।

29.  अल मुसन्नफ़, इब्ने अबी शैबा कूफ़ी, प्रसारक दारुल फ़िक्र, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1409 हिजरी क़मरी।

30.  मिनहाजुस सुन्नतिन नबविया, इब्ने तैमिया, प्रसारक मकतबा इब्ने तैमिया, क़ाहेरा, मिस्र, दूसरा एडिशन, वर्ष 1409 हिजरी क़मरी।

31.  मीज़ानुल ऐतेदाल, ज़हबी, प्रसारक दारुल कुतुबिल इल्मिया, बैरूत, लेबनान, पहला एडिशन, वर्ष 1416 हिजरी क़मरी।

32.  अल मौज़ूआत, इब्ने जौज़ी, प्रसारक दारुल कुतुबिल इल्मिया, बैरूत, लेबनान. पहला एडिशन, वर्ष 1415 हिजरी क़मरी।

 

Comments powered by CComment