तरजुमा कुरआने करीम (मौलाना फरमान अली) पारा-13

कुरआन मजीद
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और (यूं तो) मैं भी अपने नफ़्स को गुनाह से बेलौस नहीं कहता हूं क्योंकि (मैं भी बशर हूं) और नफ़्स बराबर बुराई की तरफ उभारता है मगर जिस पर मेरा परवरिदगार रहम फ़रमाए और (गुनाह से बचाए) उस में शक नहीं कि मेरा परवरदिगार बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है।
और बादशाह ने हुक्म दिया कि यूसुफ़ को मेरे पास ले आओ तो मैं उनको अपने ज़ाती काम के लिये ख़ास कर लूंगा फिर जब उसने यूसुफ़ से बातें की तो यूसुफ़ की आला क़ाबिलयत साबित हुई (और) उस ने हुक्म दिया(1) कि तुम आज (से) हमारी सरकार में यक़ीनन बा-विक़ार (और) मोअतबर हो, यूसुफ़ ने कहा (जब आपने मेरी क़द्रदानी की है तो) मुझे मुल्की खज़ानों पर मुक़र्रर कीजिए क्योंकि मैं (उस का) अमानतदार खज़ान्ची (और उसके हिसाब व किताब से भी) वाक़िफ़ हूं (गरज़ यूसुफ़ शाही ख़ज़ानों के अफ़स्र मुक़र्रर हुए) और हमन ने युसूफ़ को यूं मुल्क (मिस्र) पर काबिज़(2) बनाया कि उसमें जहां चाहे रहें हम जिस पर चाहते हैं अपने फज़्ल करते हैं और हम नेकूकारों के अज्र को अकारत नहीं करते।
और जो लोग ईमान लाए और परहेज़गारी करते रहे उनके लिए आख़ेरत का अज्र उससे कहीं बेहतर हैं (और चूंके कन्आन में भी कहत था उस वजह से) यूसुफ़ के (सौतेले भाई गल्ला ख़रीदने को मिस्र में) आए(3) और यूसूफ़ के पास गए तो यूसुफ़ उनको फ़ौरन ही पहचान लिया और वह लोग उनको न पहचान सके और जब यूसुफ़ ने उन (के गल्ले) का सामान दुरुस्त कर दिया (और वह रुख़्सत हुए) तो यूसुफ़ ने (उनसे कहा) कि (अबकी आना तो) अपने सौतेले भाई को (जिसे घर छोड़ आए हो) मेरे पास लेते आना क्या तुम नहीं देखते कि मैं यक़ीनन नाप भी पूरी देता हूं और बहुत अच्छा मेहमान नवाज़ भी हूँ(1) पस अगर तुम उसको मेरे पास न लाओगे तो तुम्हारे लिए न मेरे पास कुछ (गल्ला वग़ैरह) होगा न तुम लोग मेरे क़रीब ही चढ़ने पाओगे वह लोग कहने लगे हम उसके वालिद से उसके बारे में जाते ही दरख़्वास्त करेंगे और हम ज़रुर इस काम को करेंगे।
और यूसुफ़ ने अपने मुलाज़मों को हुक्म दिया कि उन की (जमा) पूंजी उनके बोरों में (चुपके से) रख दो ताकि जब ये लोग अपने अहल (व अयाल) के पास लौटकर जाएं तो अपनी पूंजी को पहचान लें (और उस लालच में) शायद फिर पलट कर आए ग़रज़ जब ये लोग अपने वालिद के पास पलट कर आए तो सब ने मिल कर अर्ज़ की ऐ अब्बा हमें (आइन्दा) ग़ल्ला मिलने की मोमानेअत कर दी गई है तो आप हमारे साथ हमारे भाई (बिनयामीन) को भेज दीजिए(2) ताकि हम (फ़िर) ग़ल्ला लाएं और हम उसकी पूरी हिफ़ाज़त करेंगे
याकूब ने कहा मैं उसके बारे में तुम्हारा ऐतबार नहीं करता मगर वैसा ही जैसा कि उससे पहले उसके माजाए भाई के बारे में किया था तो ख़ुदा उसका सब से बेहतर हिफ़ाज़त करने वाला है और वही सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है और जब उन लोगों ने अपने अपने अस्बाब खोले तो अपनी अपनी पूंजी को देखा कि (ऐसे के ऐसे ही) वापस कर दी गई है तो (अपने बाप से) कहने लगे ऐ अब्बा हमें (और) क्या चाहिए (देखिए) ये हमारी (जमा) पूंजी तक तो हमें वापस दे दी गई और (ग़ल्ला मुफ़्त मिला अब बिन यामीन को जाने दीजिए तो) हम अपने अहलो अयाल के वास्ते ग़ल्ला ला दें और अपने भाई की पूरी हिफ़ाज़त करेंगे और एक बारे शुतर ग़ल्ला और बढ़वा लाएंगे ये (जो अबकी दफ़ा लाए थे) थोड़ा सा ग़ल्ला है।
याकूब ने कहा जब तक तुम लोग मेरे सामने ख़ुदा से अहद न कर लोगे कि तुम उसको ज़रुर मुझ तक (सही व सालिम) ले आओगे मगर हां जब तुम ख़ुद घऱ जाओ तो मजबूरी है वरना मैं तो तुम्हारे साथ हरगिज़ उसको न भेजूँगा फिर जब उन लोगों ने उनके सामने अहद कर लिया तो याकूब ने कहा कि हम लोग जो कह रहे हैं ख़ुदा उसका ज़ामिन है और याकूब ने (नसीहतन चलते वक़्त बेटों से) कहा ऐ फ़रज़न्दों (देख़ो ख़बरदार) सब के सब एक ही दरवाज़े से न दाख़िल होना (कि कहीं नज़र न लग जाए) और मुतफ़रिक़ दरवाजों से दाख़िल होना और मैं तुम से (उस बला को जो) ख़ुदा की तरफ़ से (आए) कुछ भी टाल नहीं सकता हुक्म तो (दरअस्ल) ख़ुदा ही के वास्ते है मैंने उसी पर भरोसा किया है और भरोसा करने वालों को उसी पर भरोसा रखना चाहिए(1) और जब ये सब भाई जिस तरह उन के वालिद ने हुक्म दिया था उसी तरह (मिस्र में) दाख़िल हुए मगर जो हुक्म ख़ुदा की तरफ़ से आने को था उसे याकूब कुछ भी टाल नहीं सकते थे मगर (वहां) याकूब के दिल में तमन्ना थी जिसे उन्होंने भी यूं पूरा कर लिया क्योंकि इस में तो शक नहीं कि उसे चूंकि हम ने तालीम दी थी साहिबे इल्म ज़रुर था मगर बहुतसे लोग (उस से भी) वाक़िफ़ नहीं
और जब ये लोग यूसुफ़ के पास पहुँचे तो यूसुफ़ ने अपनी हक़ीकी भाई को अपने पास (बग़ल में) जगह दी और (चुपके से) उस (बिन यामीन) से कह दिया कि मैं तुम्हारा भाई (यूसुफ़) हूं तो जो कुछ (बदसुलूकिया) ये लोग तुम्हारे साथ करते रहे हैं उस का रंज न करो फिर जब यूसुफ़ ने उन का साज़ो सामान (सफ़र गल्ला वगैरह) दुरुस्त करा दिया तो अपने भाई के असबाब में पानी पीने का कटोरा (यूसुफ़ के इशारे) से रखवा दिया
फिर एक मनादी ललकार कर बोला कि ऐ क़ाफ़िले वालों (हो न हो) यक़ीनन तुम्हें लोग ज़रुर चोर(1) हो ये सुनकर ये लोग पुकारने वालों की तरफ़ गिर पड़े और कहने लगे (आख़िर) तुम्हारी क्या चीज़ गुम हो गयी है उन लोगों ने जवाब दिया कि हमें बादशाह का प्याला नहीं मिलता है और मैं उस का ज़ामिन हूं कि जो शख़्स उसको ला हाजि़र करेगा उस को एक बारे शुतर (ग़ल्ला इनआम) मिलेगा तब ये लोग कहने लगे ख़ुदा की क़सम तुम तो जानते हो कि (तुम्हारे) मुल्क में हम फ़साद करने की गरज़ से नहीं आए थे औह हम लोग कुछ चोर तो नहीं तब वह मुलाज़मीन बोले कि अगर तुम झूटे निकले तो फिर चोर की क्या सज़ा होगी (बे धड़क) बोल उठे कि उस की सज़ा ये है कि जिस के बारे में वह प्याला निकले तो उस का बदला(2) है (तो वह माल कि बदले में गुलाम बना लिया जाए) हम लोग तो (अपने यहां) ज़ालिमों (चोरों) को इसी तरह सजा़ दिया करते हैं।
गरज़ यूसुफ़ ने अपने भाई के सलीता ख़ुलने से क़ब्ल दूसरे भाइयों के बोरी से (तलाशी) शुरू की उसके बाद (आख़िर में) उस प्याले को यूसुफ़ ने अपने भाई के बोरे से बरआमद किया यूसुफ़ को भाई को रोकने की हम ने यू तदबीर बताई वरना (बादशाह मिस्र) के क़ानून के मुवाफिक़ अपने भाई को रोक नहीं सकते थे मगर हां जब ख़ुदा चाहे हम जिसे चाहते हैं उसके दरजे बुलन्द कर देते हैं और (दुनियां में) हर साहिबे इल्म से बढ़ कर एक और आलिम है।
(ग़रज़ बिन यामीन रोक लिये गये) तो तो ये लोग कहने लगे अगर उस ने चोरी की तो (कौन ताजुब है) उसके पहले उस का भाई (यूसुफ़) चोरी कर चुका है(1) तो यूसुफ़ ने (उस का कुछ जवाब न दिया) उसको अपने दिल में पोशीदा रखा और उन पर ज़ाहिर न होने दिया (मगर ये कह दिया कि तुम लोग पड़े ख़ाना ख़राब बुरे आदमी) हो और जो उसके भाई की चोरी का हाल बयान करते हो उससे ख़ुदा खूब वाक़िफ़ है
(उस पर) उन लोगों ने कहा ऐ अज़ीज़ इस (बिन यामीन) के वालिद बहुत बूढ़े (आदमी) हैं (और उसको बहुत चाहते हैं) तो आप उसके एवज़ हम में से किसी को ले लिजिए और उसको छो़ड़ दीजिए क्योंकि हम आपको बहुत नेकूकार बुजुर्ग समझते हैं यूसुफ़ ने कहा मआज़ अल्लाह (ये क्योंकर हो सकता है कि) हम ने जिसके पास अपनी चीज़ पाई है उसे छोड़ कर दूसरे को पकड़ लें (अगर हम ऐसा करें) तो हम ज़रुर बड़े बे इंसाफ़ ठहरे फिर जब यूसुफ़ की तरफ़ से मायूस हुए तो बाहम मशवरा करने के लिए अलग खड़े हो गए तो जो शख़्स उन सबमें बड़ा था (यहूदा) कहने लगा (भाईयों) क्या तुमको मालूम नहीं है कि तुम्हारे वालिद ने तुम लोगों से ख़ुदा का अहद लिया था और उससे पहले तुम लोग यूसुफ़ के बारे में क्या कुछ तक़सीर कर ही चुके हो तो (भाई) जब तक मेरे वालिद मुझे इजाज़त (न) दें या ख़ुद ख़ुदा मुझे को हुक्म (न) दे मैं उस सरज़मीन से हरगिज़ न टलूंगा और ख़ुदा को सब हुक्म देने वालों से कहीं बेहतर है तुम लोग अपने वालिद के पास पलट कर जाओ और उन से जाकर अर्ज़ करो ऐ अब्बा आप के साहबज़ादे ने चोरी की और हम लोगों ने तो अपनी दानिस्त के मुताबिक़ (उसके ले आने का अहद किया था और हम कुछ अज़) ग़ैबी (आफ़त) के निगेहबान तो थे नहीं और आप उस बस्ती (मिस्र) के लोगों से जिसमें हम लोग थे दरयाफ़्त कर लीजिए और उस क़ाफ़िले से भी जिसमें हम आऐं हैं (पूछ लीजिए) और हम यक़ीनन बिल्कुल सच्चे हैं (ग़र्ज जब उन लोगों ने जाकर बयान किया तो) याकूब ने कहा (उस ने चोरी नहीं की) बल्कि ये बात तुमने अपने दिल से गढ़ ली(1) है तो (ख़ैर) सब्र (और ख़ुदा का) शुक्र अदा से तो (मुझे) उम्मीद है कि मेरे सब (लड़कों) को मेरे पास पहुँचा दे बेशक वहां बड़ा वाक़िफ़दार हकीम है।
और याकूब ने उन लोगों की तरफ़ से मुँह फ़ेर लिया और (रोकर) कहने लगे हाए अफ़सोस युसुफ़ पर और (इस क़द्र रोए कि) उनकी आंखें सदमें से सफ़ेद हो गई वह दो बड़े रंज के ज़ाबित थे (ये देखकर उन के बेटे) कहने लगे कि आप तो हमेशा यूसुफ़ को याद ही करते रहियेगा यहां तक कि बीमार हो जाईयेगा या जान ही दे दिजिएगा याकूब ने कहा (मैं तुम से कुछ नहीं कहता) मैं तो अपनी बेक़रारी व रंज की शिकायत ख़ुदा ही से करता हूं और ख़ुदा की तरफ़ से जो बाते मैं जानता हूं तुम नहीं जानते हो ऐ मेरे फ़रज़नदो (एक बार फिर मिस्र) जाओ और यूसुफ़ और उसके भाई को (जिस तरह बने) ढूंढ कर ले आओ और ख़ुदा की रहमत से न उम्मीद न हो क्योंकि ख़ुदा की रहमत से काफ़िर लोगों के सिवा और कोई नाउम्मीद नहीं हुआ करता फिर जब ये लोग (सरबरह) यूसुफ़ के पास गये(1) तो (फिर) बहुत (गिड़गिड़ा) कर अर्ज़ की कि ऐ अज़ीज़ हमको और हमारे (सारे) कुन्बे को क़हत की वजह से बड़ी तकलीफ़ हो रही है और हम कुछ थोड़ी सी पूंजी लेकर आएं हैं और हमको (उसके एवज़) पूरा ग़ल्ला दिलवा दिजिए और (क़ीमत ही पर नहीं) हमको (अपना) सदक़ा ख़ैरात दीजिए उसमें तो शक नहीं कि ख़ुदा सदक़ा देने वालों के जज़ाए ख़ैर देता हैं (अब तो यूसुफ़ से न रहा गया) कहा तुम्हें कुछ मालूम है जब तुम जाहिल हो रहे थे तो तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या क्या सलूक किए (उस पर वह लोग चौंके) और कहने लगे (हाए) क्या तुम्हीं यूसुफ़ हो यूसुफ़ ने कहा हां मैं ही यूसुफ़ हूं ये और यह मेरा भाई है बेशक ख़ुदा ने मुझ पर अपना फज़्ल व (क़रम) किया इसमें शक नहीं कि जो शख़्स (उससे) डरता रहे (और मुसीबत में) सब्र करे तो ख़ुदा हरगिज़ (ऐसे नेकूकारों का) अज्र बर्बाद नहीं करता
वह लोग कहने लगे ख़ुदा की क़सम तुम्हें ख़ुदा ने यक़ीनन हम पर फ़ज़ीलत दी है और बेशक हम ही यक़ीनन (अज़ सरतापा) ख़तावार ते यूसुफ़ ने कहा अब आज से तुम पर कुछ इल्ज़ाम नहीं ख़ुदा तुम्हारे गुनाह माफ़ फ़रमाए वह तो सबसे ज़्यादा रहीम है ये मेरा कुर्ता ले जाओ(1) और उसको अब्बा जान के चेहरे पर डाल देना कि वह फिर बीना हो जाएंगे और तुम लोग अपने सब लड़के बालों को लेकर मेरे पास चले आओ और ज्योंही ये क़ाफ़िला मिस्र से चला था कि इन लोगों के वालिद (याकूब) ने कह दिया था कि अगर मुझे सठियाया हुआ न कहो तो (एक बात कहूं कि) मुझे यूसुफ की बू मालूम हो रही है वह लोग कुन्बे वाले (पौते वग़ैरह) कहने लगे आप यक़ीनन अपने पुराने ख़याले (मुहब्बत) में (पड़े हुए) हैं फिर (यूसुफ़ की) ख़ुशख़बरी देने वाला आया और उनके कुर्ते को उनके चेहरे पर डाल दिया तो याकूब फ़ौरन दोबारा आंखो वाले हो गए (तब याकूब ने बेटों से) कहा क्यों मैं तुम से न कहता था जो बातें ख़ुदा की तरफ़ से मैं जानता हूं तुम नहीं जानते उन लोगों ने अर्ज़ की ऐ अब्बा हमारे गुनाहों की मग़फ़िरत की (ख़ुदी की बारगाह में) हमारे वास्ते दुआ मांगिए हम बेशक अज़ सरतापा गुनाहगार हैं याकूब ने कहा मैं बहुत जल्द अपने परवरदिगार से तुम्हारी मग़फ़िरत की दुआ करूंगा बेशक वह बड़ा बख़्शने वाला मेहरबान है।
(ग़रज़) जब फ़िर ये लोग (मैं याकूब के) चले और यूसुफ़ शहर के बाहर लेने आए तो जब ये लोग यूसुफ़ के पास पहुंचे तो यूसुफ़ ने अपने मां बाप को अपने पास जगह दी और (उनसे ) कहा कि अब इंशा अल्लाह बड़े इत्मीनान से मिस्र में चलिए (ग़रज़ पहुंच कर) यूसुफ़ ने अपने मां बाप को तख़्त पर बिठाया और यब सब के सब यूसुफ़ की ताज़ीम के वास्ते उनके सामने सज़्दे में गिर प़ड़े (उस वक़्त) यूसुफ़ ने कहा ऐ अब्बा ये ताबीर है मेरे उस पहले ख़्वाब की कि मेरे परवरदिगार ने उसे सच कर दिखाया बेशक उसने मेरे साथ अहसान किया जब उसने मुझे क़ैद ख़ाने से निकाला और बावजूद (ये कि मुझमें) और मेरे भाईयों में शैतान ने फ़साद डाल दिया था उसके बाद भी आप लोगों को गांव से (शहर में) ले आया (और मुझसे मिला दिया) बेशक मेरा परवरदिगार जो कुछ करना चाहता है उसकी तद्बीर खूब(1) जानता है बेशक वह बड़ा वाक़िफ़दार हकीम है।
(उसके बाद यूसुफ़ ने दुआ की) ऐ परवरिदगार तूने मुझे मुल्क भी अता फ़रमाया और मुझे ख़्वाब की बातों की ताबीर भी सिखाई ऐ आसमानों और ज़मीन के पैदा करने वाले तू ही मेरा मालिक व सरपरस्त है दुनियां में भी और आख़ेरत में भी तू मुझे (दुनियां से) मुसलमान उठा ले और मुझे नेकोकारों में शामिल फ़रमा (ऐ रसूल) ये क़िस्सा ग़ैब की ख़बरों में से है जिसे हम तुम्हारे पास वही के ज़रिए भेजते हैं (और तुम्हें मालूम होता है वरना) जिस वक़्त यूसुफ़ के भाई बाहम अपने काम का मशवरा कर रहे थे और (हालांकी) हम तदबीरे कर रहे थे तुम उनके पास मौजूद न थे और कितना ही चाहो मगर बहुतसे ईमान लाने वाले नहीं हैं हालांकि तुम उनके (तब्लीग़ रिसालत का) कोई सिला भी नहीं मांगते और ये (कुरआन) तो सारे जहान के वास्ते नसीहत (ही नसीहत) है और आसमानों और ज़मीन में (ख़ुदा की कुदरत की) कितनी निशानियां हैं जिन पर ये लोग (दिन रात) गुज़ारा करते हैं और उससे मुहं फेरे रहते हैं और अक़्सर लोगों की ये हालत है कि वह ख़ुदा पर ईमान तो नहीं लाते मगर शिर्क किए जाते हैं तो क्या ये लोग उस बात से मुत्मईन हो बैठे हैं कि उन पर ख़ुदा का अज़ाब आ पड़े जो उन पर छा जाए या उन पर अचानक क़यामत ही आ जाए और उन को कुछ ख़बर भी न हो।
(ऐ रसूल) उन से कह दो कि मेरा तरीक़ा तो ये हैं कि मैं (लोगों) को ख़ुदा की तरफ़ बुलाता हूं मैं और मेरा पैरव(1) (दोनों) मज़बूत दलील पर हैं और ख़ुदा (हर ऐब व नुक़्स से) पाक व पाकीज़ा हैं और मैं मुशरेकीन से नहीं हूं
और (ऐ रसूल) तुम से पहले भी हम गांवों ही के रहने वाले कुछ मरदों को (पैग़म्बर बना कर) भेजा किये हैं कि हम उन पर वही नाज़िल करते थे तो क्या ये लोग रुए ज़मीन पर चले फिरे नहीं कि ग़ौर करते कि जो लोग उन से पहले हो गुज़रे हैं उन का अन्जाम क्या हुवा और जिन लोगों ने परहेज़ागारी इख़्तेयार की उन के लिये आख़ेरत का घर (दुनियां से) यक़ीनन बदरजा बेहतर है क्या ये लोग नहीं समझते उन पिछलो ने तबलीग़ रिसालत यहां तक की, जब (क़ौम के ईमान लाने से) पैग़म्बर मायूस हो गऐ और उन लोगों ने समझ लिया कि वह झुटलाए गये तो उन के पास हमारी (ख़ास) मदद आ पहुंची तो जिसे हम ने चाहा निजात दी और हमारा अज़ाब गुनाहगार लोगों (के सर) से तो टाला नहीं जाता उस में शक नहीं कि उन लोगों के क़िस्सों में अक़लमंदों के वास्ते (अच्छी ख़ासी) इबरत (व नसीहत) है ये (कुरआन) कोई ऐसी बात नहीं है जो (ख़्वाह मख़्वाह) गढ़ ली जाए बल्कि (जो आसमानी किताबे) उसके पहले से मौजूद हैं उन की तसदीक़ है और हर चीज़ की तफ़सील और ईमानदारों के वास्ते (अज़सरतापा) हिदायत व रहमत है।
सूरे: रअद


सूरे: रअद मदीने में नाज़िल हुआ और इसकी 43 आयतें हैं।
(ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूं) जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हैं।
अलिफ़-लाम-रा ये किताब (कुरआन) की आयतें हैं और तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से जो कुछ तुम्हारे पास नाज़िल किया गाय है बिल्कुल ठीक है मगर बहुतसे लोग ईमान नहीं लाते और ख़ुदा वही तो है जिसने आसमानों को जिन्हें तुम देखते हो बग़ैर सतून के उठा कर ख़़ड़ा कर दिया फिर अर्श (के बनाने) पर आमादा हुआ और सूरज और चांद को (अपना) ताबेदार बनाया कि हर एक वक़्त मुक़र्राह तक चला करता है वही (दुनियां के) हर एक काम का इंतेज़ाम करता है और उसी गरज़ से कि तुम लोगो अपने परवरदिगार के सामने हाज़िर होने का यक़ीन करो (अपनी) आयतें तफ़सील वार बयान करता है और वह वही है जिसने ज़मीन को बिछाया और उसमें (बड़े बड़े) अटल पहाड़ और दरिया बनाए और उसने हर तरह के मेवों की दो दो क़िस्में पैदा की (जैसे खट्टे मीठे) वही रात (के परदे) से दिन को ढक देता है उमसें शक नहीं कि जो लोग ग़ौर व फ़िक्र करते हैं उन के लिये उस में (कुदरते ख़ुदा की) बहुतसी निशानियां हैं।
और ख़ुद ज़मीन में (देखो) बहुत से टुकड़े बाहम मिले हुवे हैं और अंगूर के बाग़ और खेती और खूरमों के दरख़्त बाज़ की एक जड़ और दो(1) शाखें और बाज़ अकेला (एक ही शाख़ का) हालांकि सब एक ही पानी से सींचे जाते हैं और फ़लों में बाज़ की बाज़ पर हम तरजीह देते हैं बेशक जो अक़ल वालें हैं उनके लिए उसमें (कुदरत ख़ुदा की) बहुतसी निशानियां हैं।
और अगर तुम्हें (किसी बात पर) ताज्जुब होता है तो उन कुफ़्फ़ार का ये क़ौल ताज्जुब की बात है कि जब हम (सड़ गल कर) मिट्टी हो जाएंगे तो क्या हम (फ़िर दोबारा) एक नये जन्म में आएंगे ये वही लोग हैं जिन्होंने अपने परवरदिगार के साथ कुफ्र किया और यही वह लोग हैं जिनकी गर्दनों में (क़यामत के दिन) तौक़ पड़े होंगे और यही लोग जहन्नुमी हैं कि ये उनसें हमेशा रहेंगे और (ऐ रसूल) ये लोग तुमसे भलाई के क़ब्ल ही बुराई (अज़ाब) की जल्दी मचा रहे हैं हालांकि उनके पहले (बहुत से लोगों की) सज़ाएं हो चुकीं हैं उसमें शक नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार बावजूद उन की शरारत के लोगों पर बड़ा बख़शिश (करम) वाला है।
और उसमें भी शक नहीं कि तुम्हारा परवरदिगार यक़ीनन बहुत अज़ाब वाला है और जो लोग काफ़िर हैं कहते हैं कि उस शख़्स (मुहम्मद) पर उसके परवरदिगार की तरफ से कोई ऩिशानी (हमारी मर्ज़ी के मुताबिक़) क्यों नहीं नाज़िल की जाती
(ऐ रसूल) तुम तो सिर्फ (ख़ौफ़ ऐ ख़ुदा) से डराने वाले हो और हर क़ौम के लिए एक हिदायत(1) करने वाले हैं हर मादा जो कि पेट में लिए हुए है उसको ख़ुदा ही जानता है और बच्चों दोनों का घटना बढ़ना (भी वही जानता है) और हर चीज़ उसके नज़दीक एख अन्दाज़े से है (वही) बातिने व ज़ाहिर का जानने वाला (सब से) बड़ा (और) अलीशान है तुम लोगों में से जो कोई चुपके से बात कहे और जो शख़्स हांक पुकार के बोले और जो शख़्स रात की ताराकी हमें छिपा बैठा हैो और जो शख़्स दिन दहाड़े चला जा रहा हो (उसके नज़दीक) सब बराबर हैं (आदमी किसी हालत में हो मगर) उसके लिए उसके आगे उसके पीछे उसके निगेहबान (फ़रिश्ते) मुक़र्रर हैं कि उसकी हुक्म ख़ुदा से हिफ़ाज़त करते हैं।
जो (नेअमत) किसी क़ौम को हासिल हो जब तक वह लोग ख़ुद अपनी नफ़्सी हालत में तग़य्युर न डालें ख़ुदा हरगिज़ तग़य्युर नहीं डाला करता और जब ख़ुदा किसी क़ौम पर बुराई का इरादा करता है तो फ़िर उसका कोई टालने वाला नहीं और न उसका उसके सिवा कोई वाली और (सरपरस्त) है वह वही तो है जो तुम्हें डराने और लालच देने वास्ते बिजली की चमक दिखाता है और पानी से भरे बोझल बादलों को पैदा करता है और गरज(1) और फ़रिश्ते उसके ख़ौफ़ से उसकी हम्द व सना की तस्बीह किया करते हैं वही (आसमान से) बिजलियों को भेजता है फिर उसे जिस पर चाहता है गिरा भी देता है।
और ये लोग ख़ुदा के बारे में (ख़्वाह मख़्वाह) झगड़ा करते हैं हालांकि वह ब़ड़ा सख़्त कुव्वत वाला है (मुसाबत के वक़्त) उसी का (पुकारना) ठीक पुकारना है और जो लोग उसे छोड़़ कर (दूसरों को) पुकारते हैं वह तो उनकी कुछ सुनते तक नहीं मगर जिस तरह कोश शख़्स (बगै़र उँगलियाँ मिलाए) अपनी दोनों हथेलिया पानी की तरफ़ फैलाये ताकि पानी उसके मुंह में पहुंच जाए हालांकि वह किसी तरह पहुंचने वाला नही और (उसी तरह) काफ़िरों की दुआ गुम्राही में (पड़ी बहकी फिरा करती है) और आसमानों और ज़मीन में (मख़लूकात से) जो कोई भी है खुशी से या ज़बरदस्ती से सब अल्लाह ही के आगे सरबसजूद है और (उसी तरह) उनके साए भी सुबहा व शाम (सज्दाह करते हैं)
(ऐ रसूल) तुम पूछो कि (आख़िर) आसमान व ज़मीन का परवरदिगार कौन है (ये क्या जवाब देंगे) तुम ख़ुद कह दो कि अल्लाह है ये भी कह दो कि क्या तुमने उसके सिवा दूसरे कारसाज़ बना रखे हैं जो अपने लिए न तो नफ़ा पर कूबा रखते हैं न ज़र्रर पर (ये भी तो) पूछो की भला (कहीं) अंधा और आँखों वाला बराबर हो सकता है (हरगिज़ नहीं या कहीं) अंधेरा और उजाला बराबर हो सकता है (हरगिज़ नहीं) उन लोगों ने ख़ुदा के कुछ शरीक ठहरा रखे हैं क्या उन्होंने खु़दा ही की सी मख़लूक़ पैदा कर रखी है जिनके सबब मख़लूकात उन पर मुश्तबा हो गई है। (और उनकी ख़ुदाई के क़ायल हो गए) तुम कह दो कि ख़ुदा ही(1) हर चीज़ का पैदा करने वाला और वही यक्ता और सब पर ग़िलाब है उसी ने आसमान से पानी बरसाया फिर अपने अपने अंदाज़ से नाले बह निकले फिर पानी के रेले पर (जोश खाकर) फूला हुआ झाग (फेन) आ गया और उस चीज़ (धात) से भी जिसे ये लोग ज़ेवर या कोई अस्बाब बनाने की ग़रज़ से आग में तपाते हैं उसी तरह फेन आ जाता है (फिर अलग हो जाता है) यूं ख़ुदा हक़ व बातिल की सबब बयान फ़रमाता है (कि पानी हक़ की मिसाल और फेन बातिल की) ग़रज़ फेन तो ख़ुश्क होकर ग़ायब हो जाता है जिससे लोगों को फ़ायदा पहुंचता है (पानी) वह ज़मीन में ठहरा रहता है यूं ख़ुदा (लोगों को समझाने के वास्ते) मस्ले बयान फ़रमाता है जिन लोगों ने अपने परवरदिगार का कहा माना उनके लिए तो बेहतरी ही बेहतरी है और जिन लोगों ने उसका कहा न माना (क़यामत में उनकी ये हालत होगी) कि अगर उन्हें रुए ज़मीन के सब खज़ाने बल्कि उस के साथ इतना और मिल जाए तो ये लोग अपनी निजात के बदले उसको (बा-खुशी) दे डाले (मगर फिर भी कोई फ़ाएदा नहीं) यही लोग हैं जिनसे बुरी तरह हिसाब लिया जाएगा और आख़िर उनका ठिकाना जहन्नुम है।
और वह (क्या) बुरी जगह है (ऐ रसूल) भला वह शख़्स(1) ये जानता है कि जो कुछ तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से तुम पर नाज़िल हुआ है बिल्कुल ठीक है कभी उस के बराबर हो सकता है जो मुतलक़ अंधा है (हरगिज़ नहीं उससे तो) बस कुछ समझदार ही लोग नसीहत हासिल करते हैं (ये) वह लोग हैं कि ख़ुदा से जो अहद किया उसे पूरे करते हैं और अपने पैमान को नहीं तो़ड़ते (ये) वह लोग हैं कि जिन (ताअल्लुक़ात) के क़ायम रखने का ख़ुदा ने हुक्म दिया उन्हें कायम रखते हैं और अपने परवरदिगार से डरते हैं और (क़यामत के दिन) बुरी तरह हिसाब लिये जाने से ख़ौफ़ खाते हैं और (ये) वह लोग हैं जो अपने परवरदिगार की खुशनूदी हासिल करने की गरज़ से (जो मुसीबत उन पर प़ड़ी है) झेल गये और पाबन्दी से नमाज़ अदा की और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी थी उसमें से छुपा कर और दिखला कर (खुदा की राह मे) ख़र्च किया और ये लोग बुराई को भी भलाई से दफ़ा करते हैं- यही लोग हैं जिन के लिये आख़ेरत की ख़ूबी मख़सूस है (यानी) हमेशा रहने के बाग़ जिन में वह आप जाएंगे।
और उनके बाप दादाओं और उनकी बीवीयों और उनकी औलाद में से जो लोग नेकोकार हैं (वह सब भी) और फ़रिश्ते (बेहिश्त के हर) हर दरवाज़े से उनके पास आएंगे और सलाम अलैकुम (के बाद कहेंगे) कि (दुनियां में) तुमने सब्र किया (यह उसी का सिला है) देखो तो आख़ेरत का घर कैसा अच्छा है।
और जो लोग ख़ुदा से अहद व पैमान को पक्का करने के बाद तोड़ डालते हैं और जिन (ताअल्लुकाते बाहमी) के क़ायम रखने का ख़ुदा ने हुक्म दिया है उन्हें कतआ करते हैं और रूए ज़मीन पर फ़साद फ़ैलाते फिरते हैं ऐसे ही लोग हैं जिनके लिये लानत है और ऐसे ही लोगों के वास्ते बुरा घर (जहन्नुम) है और ख़ुदा ही भी जिसके लिये चाहता है रोज़ी को बढ़ा देता है और (जिस के लिये चाहता है) तंग करता है और ये लोग दुनिया की (चंद रोज़ा) ज़िन्दगी पर बहुत निहाल है हालांकि दुनियावी ज़िन्दगी (नईम) आख़ेरत के मुक़ाबले में बिल्कुल बे हक़ीक़त चीज़ है और जिन लोगों ने कुफ़्र इख़्तेयार किया वह कहते हैं कि उस (शख़्स यानी तुम) पर (हमारी ख़्वाहिश के मुवाफ़िक़) कोई मोजज़ा उस के परवरदिगार की तरफ़ से क्यों नहीं नाज़िल होता तुम (उन से) कह दो कि उस में शक नहीं कि ख़ुदा जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिस ने उस की तरफ़ रजूअ की उसे अपनी तरफ़ (पहुंचने की) राह दिखाता है (ये) वह लोग हैं जिन्होंने ईमान कुबूल किया और उन के दिलों को ख़ुदा की याद से तसल्ली हुवा करती है याद रखो कि ख़ुदा ही कि याद से दिलों की तसल्ली हुवा करती है।
जिन लोगों ने ईमान कबूल किया और अच्छे अच्छे काम किये उन के वास्ते (बेहिश्त में) तूबा(1) और खुशहाली और अच्छी अंजाम है (ऐ रसूल जिस तरह हम ने और पैग़म्बर भेजे थे) उसी तरह हम ने तुम को उस उम्मत में भेजा है जिस से पहले और भी बहुत सी उम्मतें गुजर चुकी हैं ताकि तुम उनके सामने जो कुरआन हम ने वही के ज़रिये से तुम्हारे पास भेजा है उन्हें पढ़ कर सुना दो और ये लोग (कुछ तुम्हारे ही नहीं बल्कि सिरे से) ख़ुदा ही के मुनकिर हैं तुम कह दो कि वही मेरा परवरदिगार है उस के सिवा कोई माबूद नहीं मैं उसी पर भरोसा रखता हूं और उस तरफ़ रूजूअ करना है और अगर कोई ऐसा कुरआन (भी नाज़िल होता) जिस की बरकत से पहाड़ (अपनी जगह से) चल खड़े होते या उसकी वजह से ज़मीन की मसाफ़त तय की जाती और उसकी बरकत से मुरदे बोल उठते (तो भी ये लोग मानने वाले न थे) बल्कि (सच यूं है कि) सब काम का इख़्तेयार खुदा ही को है।
तो क्या अभी तक ईमानदारों को चैन नहीं आया कि अगर ख़ुदा चाहता तो सब लोगों को हिदायत कर देता और जिन लोगों ने कुफ़्र इख़्तेयार किया उन पर उन की करतूत की सजा़ में कोई (न कोई) मुसीबत पड़ती ही रहेगी या (उन पर न पड़ी) तो उन के घरों के आस पास (ग़रज़) नाज़िल होगा (ज़रुर) यहां तक कि ख़ुदा का वादा (फ़तह मक्के) पूरा होकर रह और उसमें तो शक नही के खुदा हरगिज़ ख़िलाफ़े वादा नहीं करता
और ऐ रसूल तुम से पहले भी बहुतसे पैग़म्बरों की हंसी उड़ाई जा चुकी है तो मैंने (चन्द रोज़) क़ाफ़िरों को मोहलत दी फिर (आख़िरकार) हम ने उन्हें ले ड़ाला फिर (तो क्या पूछता है कि) हमारा अज़ाब कैसा था तो क्या जो (ख़ुदा) हर एक शख़्स के अमाल की ख़बर रखता है (उनको यूं ही छो़ड़ देगा हरगिज़ नहीं) और उन लोगों ने ख़ुदा के (दूसरे दूसरे) शरीक ठहराए
(ऐ रसूल) तुम उन से कह दो कि तुम आख़िर उनके नाम तो बताओ(1) या तुम ख़ुदा को ऐसे शरीकों की ख़बर देते हो जिनको वह जानता तक नहीं कि वह ज़मीन में (किधर बसते) हैं या निरी ऊपरी बातें बनाते हो बल्कि (असल ये है कि) काफ़िरों को उनकी मक्कारियां भली दिखाई गई हैं और वह (गोया) राहे रास्त से रोक दिए गए हैं और जिस शख़्स को ख़ुदा गुम्राही में छोड़ दे तो उसका कोई हिदायत करने वाला नहीं उन लोगों के वास्ते दुनियावी ज़िन्दगी में (भी) अजाब है और आख़ेरत का अज़ाब तो यक़ीनी और बहुत सख़्त खुलने वाला ही है (और) (फिर) ख़ुदा (के ग़ज़ब) से उनका कोई बचाने वाला (भी) नहीं
जिस बाग़ (बेहिश्त) का परहेज़गारों से वादा किया गया है उसकी सिफ़त ये है कि उसके नीचे नहरे जारी होंगी उसके मेवे सदाबहार और ऐसे ही उसकी छांव भी ये इंजाम है उन लोगों को जो (दुनियां में) परहेज़गार थे और काफ़िरों का अंजाम (जहन्नुम की) आग है।
और (ऐ रसूल) जिन लोगों को हम ने किताब दी है वह तो जो (अहकाम) तुम्हारे पास नाज़िल किए गए हैं सब ही से(2) खुश होते हैं और बाज़ फ़िरके उस की बाज़ बातों से इंकार करते हैं तुम (उन से) कह दो कि (तुम मानों न मानों) मुझे तो ये हुक्म दिया गया है कि मैं ख़ुदा ही की इबादत करूं और किसी को उसका शरीक न बनाऊं मैं (सब को) उसी की तरफ़ बुलाता हूं और हर शख़्स को हिर फिर कर उसकी तरफ़ जाना है।
और यूं हम ने इस कुरआन को अरबी (ज़बान) का फ़रमान नाज़िल फ़रमाया और (ऐ रसूल) अगर कहीं तुम ने उसके बाद की तुम्हारे पास इल्म (कुरआन) आ चुका उनकी नफ़्सानी ख़्वाहिशों की पैरवी कर ली तो (याद रखो कि) फिर खु़दा की तरफ़ से न कोई तुम्हारा सरपरस्त होगा न कोई बचाने वाला और हम ने तुम से पहले (भी) बहुतेरे पैग़म्बर भेजे और हम ने उनको बीवियां(1) भी दीं और औलाद (भी अता की) और किसी पैग़म्बर की ये मजाल न थी कि कोई मोजज़ा ख़ुदा के इज़्न के बग़ैर दिखाए हर एक वक़्त (मौऊद) के लिए (हमारे यहां) एक (क़िस्म की) तहरीर (होती फिर असमें से) ख़ुदा जिसको चाहता है मिटा देता है और (जिसको चाहता है) बाक़ी रखता है(2) और उसके पास अस्ल किताब (लौह महफूज़ मौजूद) है।
और (ऐ रसूल) जो जो वादे (अज़ाब वग़ैरह के) हम उन कुफ़्फ़ार से करते हैं चाहे उन में से बाज़ तुम्हारे सामने पूरे कर दिखाएं या तुम्हें उससे पहले उठा लें बहरहाल तुम पर तो सिर्फ़ (अहकाम का) पहुंचा देना फर्ज़ है और उनसे हिसाब लेना हमारा काम है क्या उन लोगों ने ये बात न देखी कि हम ज़मीन को (फ़तूहाते इस्लाम से) उसके तमाम अतराफ़ से (सिवाय कुफ़्र में) घटाते चले आते हैं और ख़ुदा जो चाहता है हुक्म देता है उसके हुक्म का कोई टालने वाला नहीं और बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है और जो लोग उन (कुफ़्फार मक्का) से पहले हो गुज़रे हैं उन लोगों ने भी पैग़म्बरों की मुख़ालिफ़त में ब़ड़ी बड़ी तद्बीरें कीं तो (ख़ाक़ न हो सका क्योंकि) सब तद्बीरें तो ख़ुदा ही के हाथ में हैं जो शख़्स जो कुछ करता है वह उसे खूब जानता है और अनक़रीब कुफ़्फ़ार को भी मालूम हो जाएगा कि आख़ेरत की खूबी किसके लिए है।
और (ऐ रसूल) काफ़िर लोग कहते हैं कि तुम पैग़म्बर नहीं हो तो तुम (उन से) कह दो कि मेरे और तुम्हारे दरमियान (मेरी रिसालत की) गवाही के वास्ते ख़ुदा और वह शख़्स(1) जिसके पास (आसमानी) किताब का इल्म है काफ़ी है।
सूरे: इब्राहीम


सूरे: इब्राहीम(1) मक्के में नाज़िल हुआ और इसमें 52 आयतें हैं।
(ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूं) जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हैं।
अलिफ़-लाम-रा- (ऐ रसूल ये कुरआन वह) किताब है जिसको हमने तुम्हारे पास इस लिए नाज़िल किया है ताकि तुम लोगों को परवरदिगार के हुक्म से (कुफ़्र की) तारीकों से (ईमान की) रौशनी में निकाल लाओ गर्ज़ उसकी राह पर लाओ जो सब ग़ालिब और सज़ावार हम्द है वह ख़ुदा जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है (ग़रज़ सब कुछ) उसी का है और (आख़ेरत में) काफ़िरों के लिए जो सख़्त अज़ाब (मोहय्या किया गया) है अफ़सोसनाक है वह कुफ़्फ़ार जो दुनियां की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी को आख़ेरत पर (जो नईम अब्दी है) तरजीह देते हैं और (लोगों) को ख़ुदा की राह (पर चलने) से रोकते हैं और उस में ख़्वा मख़्वाह कजी पैदा करना चाहते हैं यही लोग बड़े पत्ते दरजे की गुमराही में हैं और हम ने जब कभी कोई पैग़म्बर भेजा तो उस की क़ौम की ज़बान में बातें करता हुवा (ताकि उसके सामने हमारे अहकाम) बयान कर सके तो यही ख़ुदा जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसको चाहता है हिदायत करता है।
और वही सब पर ग़ालिब हिकमत वाला है और हम ने मूसा को अपनी निशानियां देकर भेजा (और ये हुक्म दिया) कि अपनी क़ौम को (कुफ़्र की) तारिकियों से (ईमान की) रौशनी में निकाल लाओ और उन्हें ख़ुदा के (वह) दिन याद दिलाओ (जिन में ख़ुदा की बड़ी बड़ी कुदरतें ज़ाहिर हुई) इस में शक नहीं उसमें तमाम सब्र शुक्र करने वालों के वास्ते (कुदरत खुदा की) बहुत एक निशानियां हैं और वह (वक़्त याद दिलाओ) जब मूसा ने अपनी क़ौम से कहा कि ख़ुदा ने जो अहसानात तुम पर किये हैं उन को याद करो जब उसने तुम पर फ़िरऔन के लोगों (के जुल्म) से निजात दी कि वह तुम को बहुत बड़े बड़े दुख दे के सताते थे तुम्हारे लड़कों को तो ज़बह कर डालते थे और तुम्हारी औरतों को (अपनी ख़िदमत के वास्ते) ज़िन्दा रहने देते थे और उस में तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से (तुम्हारे सब्र की) बड़ी (सख़्त) आज़माइश थी।
और (वह वक़्त भी याद है) जब तुम्हारे परवरदिगार ने तुम्हें जता दिया कि अगर (मेरा) शुक्र करोगे तो मैं यक़ीनन तुम पर (नेअमत की) ज़्यादती(1) करूंगा और अगर कहीं तुमने नाशुक्री की तो (याद रखो कि) यक़ीनन मेरा अजाब सख़्त है और मूसा ने (अपनी क़ौम से) कह दिया कि अगर तुम और (तुम्हारे साथ) जितने लोग रुए ज़मीन पर हैं सब के सब (मिलकर भी ख़ुदा की) नाशुक्री करो तो ख़ुदा (को ज़रा भी परवा नहीं क्योंकि वह तो बिल्कुल) बेनियाज़ है और सज़ावारे हम्द है
क्या तुम्हारे पास उन लोगों की ख़बरे नहीं पहुंची जो तुम से पहले थे (जैसे) नूह की क़ौम और आद व समूद और (दूसरे लोग) जो उन के बाद हुए (क्यों कर ख़बर होती) उन को तो ख़ुदा के सिवा कोई जानता ही नहीं उन के पास उन के (वक़्त के) पैग़म्बर मोजज़े लेकर आए (और समझाने लगे) तो उन लोगों ने उन पैग़म्बरों के हाथों को उन के मुंह पर उलटा मार दिया और कहने लगे कि जो (हुक्म लेकर) तुम ख़ुदा की तरफ़ से भेजे गये हो हम तो उस को नहीं मानते और जिस (दीन) की तरफ़ तुम हम को बुलाते हो हम तो बड़े गहरे शक में पड़े हैं (तब) उन के पैग़म्बरों ने (उनसे) कहा क्या तुम को ख़ुदा के बारे में शक है जो सारे आसमान व ज़मीन का पैदा करने वाला (और) वह तुम को अपनी तरफ़ बुलाता भी है तो इसलिये कि तुम्हारे गुनाह माफ़ कर दे और एक वक्ते मुक़र्रर तक तुमको (दुनिया में चैन से) रहने दे तो वह लोग भी बोल उठे कि तुम भी बस हमारे ही से आदमी हो (अच्छा अब समझे) तुम ये चाहते हो कि जिन माअबूदों की हमारे बाप दादा इबादत करते थे तुम हमको उनसे बाज़ रखो (अच्छा अगर तुम सच्चे हो तो) कोई साफ़ ख़ुला हुवा सरीह मोजज़ा हमें ला दिखाओ उन के पैग़म्बरों ने उनके जवाब में कहा कि इस में शक नहीं कि हम भी तुम्हारे ही से आदमी हैं मगर ख़ुदा अपने बंदों में जिस पर चाहता है अपना फ़ज़्ल व (करम) करता है (और रिसालत अता करता है) और हमारे इख़्तेयार में ये बात नहीं कि बे हुक्मे ख़ुदा (तुम्हारी फ़रमाईश के मुवाफ़िक़) हम कोई मोजज़ा तुम्हारे सामने ला सकें और ख़ुदा ही पर सब ईमानदारों को भरोसा रखना चाहिए और हमें (आख़िर) क्या है कि हम उस पर भरोसा न करें हालांकि हमें (निजात की) यक़ीनन उसी ने राहें दिखाई-और जो जो अज़ीयतें हमें पहुंचायें (उन पर हम ने सब्र किया) और आइन्दा भी सब्र करेंगे और तवक्कल करने वालों को ख़ुदा ही पर तवक्कल(1) करना चाहिए।
और जिन लोगों ने कुफ़्र इख़्तेयार किया था अपने (वक़्त के) पैगम्बरों से कहने लगे हम तो तुम को अपनी सरज़मीन से ज़रुर नीकाल बाहर करेंगे यहां तक कि तुम फिर हमारे मज़हब की तरफ़ पलट जाओ-तो उनके परवरदिगार ने उनकी तरफ़ वही भेजी कि तुम घबराओ नहीं हम उन सरकश लोगों को ज़रुर ग़ारत करेंगे-(और उनकी हलाकत के) बाद ज़रुर तुम्हीं को उस सरज़मीन में बसाएंगे ये (वादा) महज़ उस शख़्स से है जो हमारी बारगाह में (आमाल की जवाब देही में) खड़े होने से डरे और मेर अजाब से ख़ौफ़ खाए और उन पैग़म्बरों ने हमसे अपनी फ़तह की दुआ मांगी (आख़िर वह पूरी हुई) और हर एक सरकश अदावत रखने वाला हलाक हुआ (ये तो उनकी सज़ा थी) और उसके पीछे जहन्नुम है और (उस में) उसे पीप लहू भरा पानी पीने को दिया जाएगा (ज़बर्दस्ती) उसे घूंट घूंट कर पीना पड़ेगा और उसे हलक से बाआसानी न उतार सकेगा और (वह मुसीबत है कि) उसे हर तरफ़ से मौत ही मौत आती हुई दिखाई देती है हालाँकि वह मारे न मर सकेगा- और फिर उस के पीछे अज़ाब सख़्त होगा
जो लोग अपने परवरदिगार से काफ़िर हो बैठे हैं उन की मसल ऐसी है कि उन की कारस्तानियां गोया (राख का एक ढेर) हैं जिसे अधड़ के रोज़ हवा का बड़े ज़ोरों का झ़ोका उडा लेगा जो कुछ उन लोगों ने (दुनियां में) किया कराया है उस में से कुछ भी उन के क़ाबू में न होगा यही तो पल्ले दर्जे की गुमराही है क्या तू ने नहीं देखा कि ख़ुदा ही ने सारे आसमान व ज़मीन ज़रुर मस्लहत से पैदा किए अगर वह चाहे तो सब को मिटा कर एक नई ख़िल्क़त (की बस्ती) ला बसाए और ये ख़ुदा पर कुछ भी दुश्वार नहीं
और (क़यामत के दिन) लोग सब के सब ख़ुदा के सामने निकल खड़े होंगे तो जो लोग दुनियां में कमज़ोर थे बड़े इज़्ज़त वालों से (उस वक़्त) कहेंगे कि हम तो बस तुम्हारे क़दम ब क़दम चलने वाले थे तो क्या (आज) तुम ख़ुदा के अज़ाब से कुछ भी हमारे आड़े आ सकते हो वह जवाब देंगे (इस्लाह कार कुजा व मन ख़राब कुजा) काश ख़ुदा हमारी हिदायत करता तो हम भी तुम्हारी हिदायत करते-हम ख़्वाह बेक़रारी करें ख़्वाह सब्र करें (दोनों) हमारे लिए बराबर हैं (क्योंकि अज़ाब से) हमें तो अब छुटकारा नहीं और जब (लोगों का आख़री) फै़सला हो चुकेगा (और लोग शैतान को इल्ज़ाम देंगे) तो शैतान कहेगा कि ख़ुदा ने तुम से सच्चा वादा किया था (तो वह पूरा हो गया) और मैंने भी वादा किया था फिर मैंने वादा ख़िलाफ़ी की और मुझे कुछ तुम पर हुकूमत तो थी नहीं मगर इतनी बात थी कि मैंने तुम को (बुरे कामों की तरफ़) बुलाया और तुम ने मेरा कहना मान लिया तो अब तुम मुझे बुरा (भला) न कहो बल्कि (अगर कहना है तो) अपने नफ़्स को बुरा कहो (आज) न तो मैं तुम्हारी फ़रयाद को पहुंच सकता हूं और न तुम मेरी फ़रयाद रसी कर सकते हो मैं तो उस से पहले बेज़ार हूं कि तुम ने मुझे (ख़ुदा का) शरीक बनाया बेशक जो लोग नाफ़रमान हैं उन के लिए दर्दनाक अज़ाब है।
और उन लोगों ने (सिदक़ दिल से0 ईमान क़बूल किया और अच्छे (अच्छे) अमल किए वह (बेहिश्त के) उन बागों में दाख़िल किए जाएंगे जिन के नीचे नहरे जारी होंगी और वह अपने परवरदिगार के हुक्म से हमेशा उस में रहेंगे वहां उन (की मुलाक़ात) का तोहफ़ा सलाम होगा
(ऐ रसूल) क्या तुम ने नहीं देखा के ख़ुदा ने अच्छी बात (मस्लन कल्मा तौहीद) की कैसी अच्छी मिसाल बयान की है कि (अच्छी बात) गोया एक पाकीज़ा(1) दरख़्त है कि उस की मज़बूत है और उसकी टहनियां आसमान में लगी हों अपने परवरदिगार के हुक्म से हमआ वक़्त फला (फूला) रहता है और ख़ुदा लोगों के वास्ते (इस लिए) मिसाले बयान फ़रमाता है ताकि लोग नसीहत व इबरत हासिल करें और गन्दी बात (जैसे कल्माए शिर्क) का मिसाल गोया एक गन्दे दरख़्त की सी है (जिस की जड़ ऐसी कमज़ोर है) कि ज़मीन के ऊपर ही से उखाड़ फेंका जाए (क्योंकि) उसको कुछ ठहराओ तो है नहीं जो लोग पक्की बात (कलमा-ए-तौहीद) पर सिदक़ दिल से ईमान ला चुके उनको ख़ुदा दुनिया की ज़िन्दगी में (भी) साबित क़दम रखता है और आख़ेरत में भी साबित क़दम रखेगा (और उन्हें सवाल व जवाब में कोई दिक़्कत न होगी) और सरकशी को ख़ुदा गुम्राही में छोड़ देता है और ख़ुदा जो चाहता है करता है।
(ऐ रसूल) क्या तुम ने उन लोगों के हाल पर ग़ौर नहीं किया जिन्होंने मेरे अहसान के बदले नाशुक्री इख़्तेयार की और अपनी क़ौम को हलाकत के गहवारे में झोंक दिया कि सब के सब जहन्नुम वासिल होंगे और वह (क्या) बुरा ठिकाना है और यह लोग दूसरों को ख़ुदा का हमसर बनाने लगे ताकि (लोगों को) उसकी राह से बहका दें।
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि (ख़ैर चन्द रोज़ तो) चैन कर लो फिर तो तुम्हें दोज़ख़ कि पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करें और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी है उसमें से (ख़ुदा) की राह मे छिपा कर दिखला कर उस दिन (क़यामत) के आने से पहले जिम में न तो (ख़रीद व) फ़रोख़्त ही (काम आएगी) न दोस्ती मोहब्बत खर्च किया करें ख़ुदा ही ऐसा (क़ादिर व तवाना) है जिस ने सारे आसमान व ज़मीन पैदा कर डाले और आसमान से पानी बरसाया फिर उसके ज़रिये से (मुख़तलिफ़ दरख्तों से) तुम्हारे रोज़ी के वास्ते (तरह तरह के) फब पैदा किये और तुम्हारे वास्ते कशतियां तुम्हारे बस में कर दीं- ताकि उसके हुक्म से दरिया में चलें और तुम्हारे वास्ते नदियों को तुम्हारे इख़्तेयार में कर दिया- और सूरज(1) और चांद को तुम्हारा ताबेदार बना दिया कि सदा फेरी किया करते हैं और रात और दिन को तुम्हारे कब्ज़े में कर दिया (कि हमेशा हाज़िर बाश रहते हैं और अपनी ज़रुरत के मुवाफिक़) जो कुछ तुमने उससे मांगा उसमें से बक़द्र मुनासिब तुम्हें दिया और अगर ख़ुदा की नेअमतों का शुमार करना हो तो गिन नहीं सकते हैं इसमें तो शक नहीं कि इन्सान बड़ा बेइंसाफ ना शुक्रा है।
और (वह वक़्त याद करो) जब इब्राहीम ने (ख़ुदा से) अर्ज़ की थी कि परवरदिगार इस शहर (मक्का) को अमन व अमान की जगह बना दे और मुझे और मेरी औलाद को उस बात से बचा ले कि बुतों की इबादत न करने लगें ऐ मेरे पालने वाले इसमें शक नहीं कि उन बुतों ने बहुतसे लोगों को गुमराह(2) बना छो़ड़ा तो जो शख़्स मेरी पैरवी करे तो वह मुझ से हैं और जिस ने मेरी नाफ़रमानी की (तो तुझे इख़्तेयार है) तू तो बड़ा बख़शने वाला मेहरबान है ऐ हमारे पालने वाले मैं तो तेरे मुअजज़ घऱ (काबा) के पास एक बे खेती के (वीरान) बियाबान (मक्का) में अपनी कुछ औलाद को (लाकर) बसाया(1) है ताकि ऐ हमारे पालने वाले ये लोग बराबर यहां नमाज़ पढ़ा करें तो तू कुछ लोगों के दिलों को उन की तरफ़ माएल कर (ताकि वह यहां आकर आबाद हो) और उन्हें तरह तरह के फूलों से रोज़ी अता कर ताकि ये लोग (तेरा) शुक्र करें- ऐ हमारे पालने वाले जो कुछ हम छिपाते हैं और जो कुछ ज़ाहिर करते हैं तू (सबसे) खूब वाक़िफ़ है और ख़ुदा से तो कोई चीज़ छिपी नहीं (न) ज़मीन में और न आसमान में उस ख़ुदा का (लाख लाख) शुक्र है जिसने मुझे बुढ़ापा(2) आने पर इस्माईल व इस्हाक से दो (फरज़न्द) अता किये उस में शक नहीं कि मेरा परवरदिगार दुआ का सुनने वाला है- ऐ मेरे पालने वाले मुझे और मेरी औलाद को (भी) नमाज़ का पाबंद बना दे और ऐ मेरे पालने वाले मेरी दुआ कबूल फ़रमा ऐ हमारे पालने वाले जिस दिन (आमाल का) हिसाब होने लगे-मुझ को और मेरे मां बाप को और सारे ईमानदारों को तू बख़्श दे और जो कुछ ये ज़ालिम (कुफ़्फ़ारे मक्का) किया करते हैं उससे ख़ुदा को ग़ाफ़िल न समझना (और उन पर फ़ौरन अज़ाब न करने की) सिर्फ़ ये वजह है कि उस दिन तक की मोहलत देता है जिस दिन लोगों की आँखों के ढेले (ख़ौफ़ के मारे) पथरा जाएंगे और अपने अपने सर उठाएं भागे चले जा रहे हैं (टकटकी बंधी है कि) उनकी तरफ़ उनकी नज़र नहीं लौटती (जिधर देख रहे हैं) और उन के दिल हवा हो रहे हैं।
और (ऐ रसूल) लोगों को उस दिन से डराओ (जिस दिन) उन पर अज़ाब नाज़िल होगा तो जिन लोगों ने नाफ़रमानी की थी (गिड़गिड़ा कर) अर्ज़ करेंगे ऐ हमारे पालने वाले हम को थोड़ी सी मोहलत और दे दे (अबकी बार) हम तेरे बुलाने पर ज़रुर उठ खड़े होंगे और सब रसूलों की पैरवी करेंगे (तो उन को जवाब मिलेगा) क्या तुम वह लोग नहीं हो जो उस के पहले (उस पर) क़स्में खाया करते थे कि तुम को किसी तरह का ज़वाब नहीं (और क्या तुम वह लोग नहीं कि) जिन लोगों ने (हमारी नाफ़रमानी कर के) आप अपने ऊपर ज़ुल्म किया उन्हीं के घरों में तुम भी रहे हालाँकि तुम पर ये भी ज़ाहिर हो चुका था कि हम ने उन के साथ कैसा (बरताव) किया और हम ने (तुम्हारे समझ़ाने के वास्ते) मसलें भी बयान कर दी थी और वह लोग अपनी चालें चलते रहे (और कभी बाज़ न आए) हालाँकि उन की सब हालतें ख़ुदा की नज़र में थी और अगर चे उन की मक्कारियां (उस गज़ब की) थी कि उन से पहाड़ (अपनी जगह से)(1) हट जाएं (मगर सब हेच थी) तो तुम ये ख़्याब (भी) न करना कि ख़ुदा अपने रसूलों से ख़िलाफ़ वादा करेगा उस में शक नहीं कि ख़ुदा (सब से) ज़बरदस्त बदला लेने वाला है।
(मगर कब) जिस दिन ये ज़मीन(1) बदल कर दूसरी ज़मीन कर दी जाएगी और (उसी तरह) आसमान (भी बदल दिए जाएंगे) और सब लोग यक्ता कहार ख़ुदा के रूबरु (अपनी अपनी जगह से) निकल खड़े होंगे और तुम उस दिन गुनाहगारी को देखोगे कि ज़न्ज़ीरों मे जकड़े हुए होंगे उन के (बदन के) कप़ड़े क़तरान के होंगे और उनके चेहरों को आग (हर तरफ़ से) ढांके होगी ताकि ख़ुदा हर शख़्स को उस के किए का बदला दे (अच्छा तो अच्छआ बुरा तो बुरा) बेशक खुदा बहुत जल्द हिसाब लेने वाला है ये (कुरआन) लोगों के लिए एक क़िस्म की इत्तेला है ताकि लोग उस के ज़रिए से (अज़ाब ख़ुदा से) डराए जाएं- और ताकि ये भी यक़ीन जान लें कि बस वही (ख़ुदा) एक माबूद है और ताकि जो लोग अक़ल वाले हैं नसीहत व इबरत हासिल करें।


सूरे: हिज्र

 

सूरे: हिज्र (1) मक्के में नाज़िल हुआ और इसमें 66 आयतें हैं।
(ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूं) जो बड़ा मेहरबान और रहम करने वाला हैं।
अलिफ़-लाम-रा- ये किताब (ख़ुदा) और वाज़ेह व रौशन कुरआन की (चन्द आयतें हैं)

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